आज मैं बात कर रहा हूँ हिंदी की दस सर्वश्रेष्ठ क्लासिक फिल्मों की.यह वो फिल्में हैं जिन्हें देखना एक सुखद अनुभव होता है और बार-बार देखने की इच्छा बनी रहती है.और यदि बार-बार देखने को न मिले तब भी यह फिल्में आपके अंतर्मन में चलती ही रहती हैं और जब भी फिल्म की शास्त्रीयता की बात होती है तो इन्हीं चंद फिल्मों का नाम ज़ुबान पर आता है.इन्हें आप फिल्मों का जादू भी कह सकते है और यदि फिल्मों को परिभाषित करना हो तो तब भी यही फिल्में सामने आती हैं.फिल्मों का यदि कोई स्कूल हो तो तब भी वो यही फिल्में होगीं जो उस स्कूल का प्रतिनिधित्व करेगीं.
एक शास्त्रीयता में ढली-रची-बसी यह फिल्में,सुन्दर-सुघड़ सौन्दर्य का जीवंत उदहारण प्रस्तुत करती हैं.फ्रेम-दर-फ्रेम फिल्म कुछ यूँ आगे बढती हैं कि देखनेवाला अपने को भूलने लगता है और जब फिल्म ख़त्म होती है तो वह उसके जीवन का स्थाई भाव बन जाती है.उसे लगता है कि वह फिल्म देखकर नहीं वरन उसे जीकर आ रहा हो या उसे लगता है कि अरे यह तो उसी पर बनी है,उसी के परिवेश की बात कह रही है.कितना सच कहा गया है,कितना अपनापन है,कितना आंदोलित करती है,हाँ समाज को बदलना ही होगा.अब यह सब नहीं चलेगा.ऐसी ढेर सारी बातें उस देखने वाले के मनो-मस्तिष्क में चलती ही रहती हैं.यह फिल्में एक अलग छाप छोड़ती हैं.
क्या ऐसी कोई फिल्म आपको याद आ रही है,क्या कहा हाँ......पता नहीं.....नहीं.....,चलिए मैं ही बताये देता हूँ.मैंने हिंदी फिल्मों की दस सर्वश्रेष्ठ क्लासिक फिल्मों की सूची तैयार की है,जो आज भी अपनी एक अलग जगह रखती हैं और एक फिल्म बनाने वाले के लिए यह फिल्में आज भी एक श्रध्दा का भाव रखती हैं और एक ऐसी क्लासिक देने की चाह उस हर व्यक्ति के मन में होती है,जो कहीं-न कहीं फिल्म के निर्माण-निर्देशन से जुड़ा हुआ है.प्रस्तुत है यह सूची -
१. अछूत कन्या -
अपने दौर की बाम्बे टाकीज की वो क्लासिक है,जिसका जबाब आज भी कहीं नहीं है.
२. आदमी -
व्ही.शांताराम की सबसे क्लासिक कृति है यह फिल्म और अपने दौर की एक बोल्ड प्रेम कहानी भी है.
३ झाँसी की रानी -
सोहराब मोदी का ऑपेरा,पारसी थियेटर की शैली,इस जादू का आज भी तोड़ नहीं है.इतिहास की ऐसी प्रस्तुति आज संभव नहीं है.
४. दो बीघा ज़मीन -
यह फिल्म उस दौर में जितनी जीवंत थी,आज उससे कहीं ज़्यादा जीवंत है.प्रगति के तमाम पायदानों के ऊपर बैठे हुए हम लोगों के नीचे आज भी असंख्य लोगो के लिए दो बीघा ज़मीन के लिए संघर्ष वैसा का वैसा ही है
५. जागते रहो -
आरके की यह फिल्म.सिर्फ़ फिल्म ही नहीं समाज का आइना भी है,जो आज भी वैसा ही है.बल्कि आज तो यह आइना और भी कारपोरेट हो गया है.
६. बंदिनी -
नहीं देखी हो देख लें और प्रेम की पावन उत्कंठा को अपनी आत्मा तक महसूस करें.मैं विश्वास दिलाता हूँ कि इस प्रेम की बेकरारी आप अपने लिए भी चाहेगें.
७. देवदास -
के.एल.सहगल और दिलीप कुमार दोनों जैसे एक ही धारा के दो रूप हों,जैसे एक राग-दो रागनियाँ हों.
८. तीसरी कसम -
जीवन कितना भोला और मासूम हो सकता है कि हम सब हीरामन हो जाना चाहेगें.
९. साहब-बीवी और गु़लाम -
इस फिल्म की विशेषता यही है कि इस पर बोलना-लिखना आसान लगता है,पर है मुश्किल.पर गुरुदत्त का ही हो जाने का जी चाहता है.करीब १३०० पन्नों के उपन्यास को तीन घंटे के रूपक में बदल देना और वो भी मूल कहानी और उसकी आत्मा से बिना छेड़छाड़ किये हुए अदभुद है अदभुद.
१०. शतरंज के खिलाडी -
प्रेमचंद की कलम का जादू तो है ही पर सत्यजीत राय का जादुई स्पर्श इस कहानी को इतिहास में बदल देता है.
मैं जानता हूँ कि सिर्फ़ दस फिल्मों को इस तरह शामिल करना स्वयं के साथ ही नहीं सिनेमा की रचनाधर्मिता के साथ भी अन्याय ही है,पर यह तो शुरुआत भर है.उक्त सूची को पढ़कर आपके ज़ेहन में भी ऐसी कई फिल्मों के नाम चलचित्र की तरह उभर रहे होगें जो इस सूची में शामिल नहीं हैं, पर आप उन्हें मुझसे शेयर कर सकते हैं.
आज इतना ही,
शेष फिर......!
मेरी कहानियां,जिन्होंने मुझे मेरी पहचान दी है.अब इस पहचान का परिचय मैं आप सब सुधीजनों को देने जा रहा हूँ.अमृत की कुछ बूंदें,जिनसे मुझे जीवन मिला है,आपके साथ बाँट रहा हूँ.
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मंगलवार, 31 मार्च 2009
शुक्रवार, 27 मार्च 2009
सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्में...
मित्रों, मैं पिछले दिसम्बर से 100 सबसे ज़्यादा देखे जाने वाली हिंदी फिल्म्स् की सूची बनाने में लगा हुआ हूँ.और पिछले तीन माह का अनुभव बताता है कि यह सूची 100 से ऊपर भी जा सकती है,पर मैं एक अनुशासन बनाये रखने को प्रतिबद्ध हूँ.अभी जब संजीव सारथीजी का ब्लॉग पर लेख पढ़ रहा था तो मुझे लगा की मेरे जैसे और भी लोग हैं जो इस तरह के कार्य में संलग्न हैं.यह अच्छी बात नहीं,वरन बहुत ही सुखद बात है. हिंदी सिनेमा ने हमे बहुत गहरे तक छुआ है और यही वह सिनेमा है जो हिकारत की नज़रों से भी देखा गया है.मुझे अक्सर सुनने को मिलता रहा है कि तुम जैसे लेखक को-बुद्धिजीवी को सिनेमा पर नहीं लिखना चाहिए.मैंने उनसे पूछता हूँ कि क्या हिंदी सिनेमा इतना दोयम दर्ज़े का है कि उस हम जैसे लोगों को बात नहीं करना चाहिए,तो फिर उन असंख्य दर्शकों का क्या,क्या वह भी दोयम दर्ज़े के हैं.क्या दोयम दर्ज़े के लोगों द्वारा दोयम दर्ज़े के लोगों के लिए ही सिनेमा है? अगर ऐसा है तो फिर आस्कर की और हम सब इतना लालायित क्यों हो जाते हैं.क्यों सब के सब इतना बौरा जाते हैं कि आस्कर दुनिया का सबसे बड़ा सच हो जाता है?
पर ऐसा है नहीं और तथाकथित-कतिपय लोगों को ऐसा लगता भी है तो यह उनकी अपनी समस्या है.मुझे तो सिनेमा से प्यार है और वह भी अव्वल दर्ज़े का.तो बात हो रही थी सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म्स् कि तो सारथीजी के लेख में जिन फिल्म्स् का नाम है,उनमें से मैं एक फिल्म."हम आपके हैं कौन" को छोड़कर बाकी सभी पर सहमत हूँ.अंत में विनोदजी ने एक समीक्षक की पसन्द की जिन फिल्म्स् की सूची दी,वह सभी ऐसी फिल्म्स् हैं,जिनके बारे में मेरा मत यह है कि जिसे भी फिल्म्स् की ज़रा-सी भी समझ हो और लिखने का हुनर तथा कला के प्रति अनुराग-आग्रह,वह इन फिल्म्स् को जगह देगा ही. इनमें भी "नीचा नगर" को हम विश्व-सिनेमा की कालजयी कृति कह सकतें हैं.यहाँ में एक और नाम जोड़ना चाहूगां,"दो बीघा ज़मीन". "बायसिकल थीफ" जो सम्मान विश्व-सिनेमा में हासिल है,"दो बीघा ज़मीन" उससे कहीं ज़्यादा सशक्त कृति है."गर्म हवा" अपना जो विशेष प्रभाव छोड़ती है,वही विशेष प्रभाव हम एक लम्बे गेप के बाद "पिंजर" में भी महसूस करते हैं.अपने सशक्त अभिनय से उर्मिला मार्तोंडकर फिल्म-इतिहास में अपना पन्ना जोड़ने में सफल रहीं हैं.लेकिन ध्यान रहे की फिल्म्स् की समीक्षा और समीक्षक फिल्म्स् अलग-अलग चीजें हैं.अंतर बहुत बड़ा नहीं है,बस रेशम और कोसा जैसा है.यहाँ भी प्रश्न खड़े किये जा सकते हैं कि आखिर कौन-सी फिल्म्स् समीक्षा के लिए हैं और समीक्षक की फिल्म्स् कौन-सी हो सकती हैं.मेरे लिए दस सर्वश्रेष्ठ फिल्म्स् चुनना थोडा मुश्किल काम होगा,हाँ दस-दस श्रेष्ठ फिल्म्स् की दस अलग-अलग सूचियाँ बना सकता हूँ.फिलहाल मेरी पहली सूची कुछ यूँ होगी -
१. अछूत कन्या,
२. दुनिया न माने,
३. आवारा,
४. मदर इंडिया.
५.मुझे जीने दो,
६. गाइड,
७.पाकीजा,
८.बाबी
९.शोले,
१०.जाने भी दो यारों.
- शेष फिर.....!
पर ऐसा है नहीं और तथाकथित-कतिपय लोगों को ऐसा लगता भी है तो यह उनकी अपनी समस्या है.मुझे तो सिनेमा से प्यार है और वह भी अव्वल दर्ज़े का.तो बात हो रही थी सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म्स् कि तो सारथीजी के लेख में जिन फिल्म्स् का नाम है,उनमें से मैं एक फिल्म."हम आपके हैं कौन" को छोड़कर बाकी सभी पर सहमत हूँ.अंत में विनोदजी ने एक समीक्षक की पसन्द की जिन फिल्म्स् की सूची दी,वह सभी ऐसी फिल्म्स् हैं,जिनके बारे में मेरा मत यह है कि जिसे भी फिल्म्स् की ज़रा-सी भी समझ हो और लिखने का हुनर तथा कला के प्रति अनुराग-आग्रह,वह इन फिल्म्स् को जगह देगा ही. इनमें भी "नीचा नगर" को हम विश्व-सिनेमा की कालजयी कृति कह सकतें हैं.यहाँ में एक और नाम जोड़ना चाहूगां,"दो बीघा ज़मीन". "बायसिकल थीफ" जो सम्मान विश्व-सिनेमा में हासिल है,"दो बीघा ज़मीन" उससे कहीं ज़्यादा सशक्त कृति है."गर्म हवा" अपना जो विशेष प्रभाव छोड़ती है,वही विशेष प्रभाव हम एक लम्बे गेप के बाद "पिंजर" में भी महसूस करते हैं.अपने सशक्त अभिनय से उर्मिला मार्तोंडकर फिल्म-इतिहास में अपना पन्ना जोड़ने में सफल रहीं हैं.लेकिन ध्यान रहे की फिल्म्स् की समीक्षा और समीक्षक फिल्म्स् अलग-अलग चीजें हैं.अंतर बहुत बड़ा नहीं है,बस रेशम और कोसा जैसा है.यहाँ भी प्रश्न खड़े किये जा सकते हैं कि आखिर कौन-सी फिल्म्स् समीक्षा के लिए हैं और समीक्षक की फिल्म्स् कौन-सी हो सकती हैं.मेरे लिए दस सर्वश्रेष्ठ फिल्म्स् चुनना थोडा मुश्किल काम होगा,हाँ दस-दस श्रेष्ठ फिल्म्स् की दस अलग-अलग सूचियाँ बना सकता हूँ.फिलहाल मेरी पहली सूची कुछ यूँ होगी -
१. अछूत कन्या,
२. दुनिया न माने,
३. आवारा,
४. मदर इंडिया.
५.मुझे जीने दो,
६. गाइड,
७.पाकीजा,
८.बाबी
९.शोले,
१०.जाने भी दो यारों.
- शेष फिर.....!
सोमवार, 27 अक्टूबर 2008
हिन्दी सिनेमा
आज मैं हिन्दी सिनेमा के विषय में फिर से लिखने जा रहा हूँ. हिन्दी सिनेमा ने बीते एक दशक में वह काम किया है जो राष्ट्रवाद की धुरी पर कोई नेता नहीं कर पाया है और वह काम है देश को सही अर्थों में एकता का पाठ पढ़ाना.सिनेमाई एकता एक मेलोड्रामा लग सकती है पर सच यह है कि यही मेलोड्रामा बिना कोई भाषण दिए,बिना कोई उपदेश दिए,बिना कोई नारा दिए आपको अपने से-अपने देश से बांधे रखता है.यहाँ देशभक्ति कोई दिखावा नहीं वरन एक सच है,जिसे एक ही थिएटर में कई-कई समूह जो भिन्न-भिन्न वर्ग से आतें हैं,एक साथ बैठकर सिनेमा का आनंद लेते हैं और एक संतोष के साथ टाकिज से बाहर निकलते हैं.अपने निजी समारोह में फिल्मी गानों की धुन पर थिरकते हैं,बिना किसी पूर्वाग्रह के.यह लोग तब किसी भी आन्दोलन की परवाह भी नहीं करते हैं कि कौन मराठी है और कौन उत्तरी है या कौन इस देश के किस भाग से आया है,क्या करता है,कौन-सी भाषा बोलता है,किस संस्कृति को मानता है.सब बातें गौण हो जाती हैं, जब बात हिन्दी सिनेमा कि आती है,जहाँ सब-कुछ एक है,जहाँ सही अर्थों में भारत बसता है - भारतीयता बसती है.
आज इतना ही......शेष फिर.
आज इतना ही......शेष फिर.
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