<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105</id><updated>2012-01-26T20:13:15.660+05:30</updated><category term='उपन्यास'/><category term='मेरे लेख :जैसा मैंने अनुभव किया.'/><category term='भारतीय सिनेमा और मैं'/><category term='मेरी कहानियाँ'/><title type='text'>मेरा कथा संसार</title><subtitle type='html'>मेरी कहानियां,जिन्होंने मुझे मेरी पहचान दी है.अब इस पहचान का परिचय मैं आप सब सुधीजनों को देने जा रहा हूँ.अमृत की कुछ बूंदें,जिनसे मुझे जीवन मिला है,आपके साथ बाँट रहा हूँ.</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>24</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-7804909833366174353</id><published>2012-01-26T14:12:00.000+05:30</published><updated>2012-01-26T14:14:16.545+05:30</updated><title type='text'>यह हमारा गणतंत्र है........!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-2QDDrt2AeQc/TyEIr_OIGvI/AAAAAAAAAsI/rPD_-YbRYIM/s1600/5-a.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://4.bp.blogspot.com/-2QDDrt2AeQc/TyEIr_OIGvI/AAAAAAAAAsI/rPD_-YbRYIM/s200/5-a.jpg" width="160" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: x-small;"&gt;आज लम्बे समय बाद ब्लॉग पर आना हुआ है और वो भी गणतंत्र की धूमधाम के बीच .भारत के कुछ समारोह हैं जो सभी&amp;nbsp;सीमायों से परे जाकर हम सब&amp;nbsp; भारतवासी मनाते हैं और उनमें से यह एक है.मैं कल से टीवी पर देख रहा हूँ इस पर्व को किस तरह कवर किया जा रहा है और सबसे सुखद तो यह है कि इस बार हमने अपने अंधकार में झाँकने की कोशिश नहीं की और न ही हमने गणतंत्र के बहाने अपने शाश्वत घावों को कुरेदा है,जो हम अक्सर देखते चले आ रहे हैं.सडन अभी भी मौजूद है और शायद कहीं ज्यादा भयानक तरीके से मौजूद है पर हमारे पास गर्वित होने के भी कई कारण हैं जिन पर गर्व किया जा सकता है और यही कारण हमारे भविष्य के लिए प्रेरणास्त्रोत का भी काम करते हैं.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: x-small;"&gt;मेरा मानना है की हमे अपने इन्हीं प्रेरणास्त्रोतों&amp;nbsp; पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए ताकि हम एक मुस्कुराता हुआ-खिलखिलाता हुआ भारत न केवल बनता हुआ देख सके वरन उसके बनने में सहभागी भी हो सके. हम यदि यह मानते हैं कि हम कमज़ोर है तो हमे यह भी मान लेना चाहिए कि हम अपनी तमाम कमजोरियों के साथ शक्तिशाली भी है और यह शक्ति हमे देते हैं हमरे आस-पास के वो लोग जो हमारे नायक हैं और वो भी बिना किसी घोषणा के,बिना किसी आन्दोलन के,बिना किसी साधन के.......यह लोग न तो अन्ना हजारे बन सकते हैं,न ही यह लोग बाबा रामदेव या श्री श्री रविशंकर बन सकते हैं,न ही यह लोग कभी कोई आन्दोलन खड़ा कर सकते हैं पर यह हैं वो लोग जो स्वयं में एक आन्दोलन हैं,स्वयं में परिवर्तन के वाहक हैं.मैं किसी के का नाम नहीं ले रहा हूँ क्योकि उसका कोई मतलब नहीं है पर यदि आप अपने आस-पास देखेगें तो ऐसे नायक ज़रूर पायेगे.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: x-small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace; font-size: x-small;"&gt;आज हमे यह मान&amp;nbsp;लेने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि बाबा रामदेव भटक चुके हैं और अन्ना हजारे का आन्दोलन अपनी सार्थकता पर एक प्रश्नचिंह लगवा चूका है.यह भटकाव भी गणतंत्र को शक्ति ही देगा ऐसा मेरा मानना है. &amp;nbsp; &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-7804909833366174353?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/7804909833366174353/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=7804909833366174353' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/7804909833366174353'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/7804909833366174353'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='यह हमारा गणतंत्र है........!'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-2QDDrt2AeQc/TyEIr_OIGvI/AAAAAAAAAsI/rPD_-YbRYIM/s72-c/5-a.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total><georss:featurename>भोपाल, मध्य प्रदेश, भारत</georss:featurename><georss:point>23.2599333 77.412615</georss:point><georss:box>23.1432293 77.2546865 23.3766373 77.5705435</georss:box></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-8375173664862401266</id><published>2011-01-04T21:17:00.000+05:30</published><updated>2011-01-04T21:17:58.007+05:30</updated><title type='text'>मेरा कथा संसार: भारत के आज के सबसे बुरे चेहरे</title><content type='html'>&lt;a href="http://neerajgurubadal.blogspot.com/2010/10/blog-post_03.html"&gt;मेरा कथा संसार: भारत के आज के सबसे बुरे चेहरे&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-8375173664862401266?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2010/10/blog-post_03.html' title='मेरा कथा संसार: भारत के आज के सबसे बुरे चेहरे'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/8375173664862401266/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=8375173664862401266' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/8375173664862401266'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/8375173664862401266'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='मेरा कथा संसार: भारत के आज के सबसे बुरे चेहरे'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-4120954603446022510</id><published>2010-10-03T23:09:00.002+05:30</published><updated>2010-12-17T12:10:43.641+05:30</updated><title type='text'>भारत के आज के सबसे बुरे चेहरे</title><content type='html'>&lt;b&gt;भारत के आज के सबसे बुरे चेहरे&lt;i&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में आज कुछ लोग और कुछ  कार्य ऐसे हैं जिन्होंने भारत की छबि बनाने की जगह आज भारत की छबि को दुनिया के सामने तो दाग़दार बनाया ही है साथ हम भारतवासियों को भी असीम दुःख दिया है.यह लोग और यह कार्य ऐसे हैं,जिन्हें उन लोगो के भरोसे पर छोड़ दिया गया या ऐसे  लोगो को यह जिम्मेदारी सौपीं गई जिन्हें ईश्वर ने एक अवसर दिया था इतिहास के पन्नों में सदैव के लिए एक सच्चे राष्ट्रभक्त-एक सच्चे हीरो की तरह दर्ज़ होने का,लेकिन यह लोग चूक गए और दूसरी तरफ हमने कुछ ऐसे लोगो को दण्डित किया या उन्हें उनके कामों से बेदखल किया जिन्होंने अपने कामों से न केवल भारत में वरन विश्व में भी भारत की शानदार शक्तिशाली छबि पेश की थी और यह वो लोग थें जिन्होंने जनता की गाढ़ी  कमाई का एक पैसा भी नहीं खाया,पर प्रचार ऐसे किया गया कि यह तो राष्ट्रद्रोही हैं.यह है हमारे तंत्र का दोहरा चेहरा और हमारा भोलापन कि हम आज भी सही और गलत की पहचान नहीं कर पा रहे हैं.&lt;br /&gt;आज मैं भारत के सबसे बुरे चेहरे आप लोगों के सामने रख रहा हूँ और इनसे परे मैं जिन लोगों की बात कर रहा हूँ उन्हें आपको पहचान कर मुझे बताना है.देखते हैं कि हमारे विचार यहाँ कितने मिलते हैं.....तो प्रस्तुत है भारत के आज के सबसे बुरे चेहरे.&lt;br /&gt;१. सुरेश कलमाड़ी,&lt;br /&gt;२. शरद पवार,&lt;br /&gt;३. के.पी.एस.गिल,&lt;br /&gt;४. जवाहर लाल नेहरु शहरी नवीनीकरण योजना (JNNRUM ),&lt;br /&gt;५. महात्मा गाँधी ग्रामीण रोज़गार योजना (मनरेगा),&lt;br /&gt;६. रेड्डी बंधु,&lt;br /&gt;७. राज ठाकरे,&lt;br /&gt;८. प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना,&lt;br /&gt;९. ए.राजा &lt;br /&gt;१०.नीरा राडिया&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-4120954603446022510?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/4120954603446022510/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=4120954603446022510' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/4120954603446022510'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/4120954603446022510'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2010/10/blog-post_03.html' title='भारत के आज के सबसे बुरे चेहरे'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-7775406615798525246</id><published>2010-10-03T21:30:00.002+05:30</published><updated>2010-10-04T00:00:05.662+05:30</updated><title type='text'>कविता,  "कोई तुम-सा....,"</title><content type='html'>&lt;b&gt;कोई तुम-सा....,&lt;i&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई तुम-सा,&lt;br /&gt;रात स्वप्न में आकर छेड़ जाता है मुझे,&lt;br /&gt;ख्यालों में हलचल मचा जाता है,&lt;br /&gt;दिन भर काम में डूबे रहने के बाबजूद भी-&lt;br /&gt;अचानक विचारों की एक श्रंखला बना जाता है,&lt;br /&gt;शाम के डूबते सूरज के आगे बादल बन आ जाता है वो,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं और मैं जानता भी नहीं-कि /&lt;br /&gt;कौन है वो और -&lt;br /&gt;क्यों इस तरह करता है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये शरारत है तो ठीक है,&lt;br /&gt;ये मस्ती है तो ठीक है,&lt;br /&gt;ये उसके जीने का एक आयाम है तो भी ठीक है,&lt;br /&gt;मुझे भी कभी-कभी खुद को यूँ छेड़ा जाना अच्छा लगता है,&lt;br /&gt;चाहता भी हूँ कि यह सिलसिला यूँ ही हर पल चलता रहे,&lt;br /&gt;पर मैं - सीधा-सीधा यूँ तुम्हरी यादों का सामना नहीं कर पाता हूँ,&lt;br /&gt;और - &lt;br /&gt;कहता हूँ,&lt;br /&gt;ये तुम नहीं.......,&lt;br /&gt;कोई तुम-सा है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-7775406615798525246?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/7775406615798525246/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=7775406615798525246' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/7775406615798525246'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/7775406615798525246'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='कविता,  &quot;कोई तुम-सा....,&quot;'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' 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/&gt;हाँ तुम्हे अपनी पोती के पीछे कहीं ज़्यादा सुकून से दौड़ता हुआ पाया,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी असीम इच्छाएं पूरी करने के लिए,&lt;br /&gt;अलसभोर से देर रात तक तुम्हे दौड़ता हुआ ही पाया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर.......आज जब,&lt;br /&gt;तुम अपनी एड़ी की वज़ह से चल भी नहीं पा रही हो,&lt;br /&gt;जबकि हम जानते हैं कि-&lt;br /&gt;तुम्हे आज भी हमारे पीछे दौड़ना अच्छा लगता है,&lt;br /&gt;यहाँ हममे से किसी के पास भी समय नहीं है कि -&lt;br /&gt;तुम्हे फिर से दौड़ने के काबिल बनाने के लिए -&lt;br /&gt;तुम्हारा इलाज करा सके,&lt;br /&gt;आज हम सब-&lt;br /&gt;अपनी-अपनी ही दुनियाओं में दौड़ लगा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...........और तुम कहीं पीछे छूट-सी गई हो.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-8222973271234415929?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/8222973271234415929/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=8222973271234415929' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/8222973271234415929'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/8222973271234415929'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2010/05/blog-post_10.html' title='.....तुम्हारा दौड़ना.'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-1739350378754834154</id><published>2010-05-03T10:47:00.000+05:30</published><updated>2010-05-03T10:47:47.746+05:30</updated><title type='text'>.......मोक्ष तक.</title><content type='html'>उस रात -&lt;br /&gt;स्वप्न के बिछौने  पर,&lt;br /&gt;जहाँ-&lt;br /&gt;मेरा प्रेम सावन बन बरस रहा था,&lt;br /&gt;और वहीँ -&lt;br /&gt;तुम्हारी देह - भादों-सी उफनकर मचल पड़ी थी,&lt;br /&gt;इस अलौकिक प्रेम के ज्वार में,&lt;br /&gt;तुम्हारी देह का वह सौन्दर्य  -&lt;br /&gt;मेरी देह के सप्तक से मिलकर,&lt;br /&gt;मिलन का एक राग छेड़ बैठे थें,&lt;br /&gt;उस रात में-उस राग में-उस बिछौने पर,&lt;br /&gt;हम-तुम -&lt;br /&gt;रच-बस-गुंथ-मिल-लिपट / कुछ यूँ यहाँ-वहां हो रहे थें / कि -&lt;br /&gt;तुम्हारे घुंघराले केशों में मेरी उँगलियाँ  -&lt;br /&gt;मानो सितार पर मध्यम स्वर छेड़ रही हो,&lt;br /&gt;और उधर - तुम्हारी आतप्त हथेलियाँ,&lt;br /&gt;मानो मेरी पीठ पर नृत्य कर रही हों,&lt;br /&gt;हमारी गहरी साँसों-स्पंदन-मचलती शिराओं के साथ,&lt;br /&gt;फिर कुछ यूँ हुआ कि -&lt;br /&gt;श्वासें - श्वासों में गुम,&lt;br /&gt;धड़कने - धडकनों में बंद,&lt;br /&gt;आँखें - आँखों में डूबी,&lt;br /&gt;शहद-से घुलते होठों से होठ,&lt;br /&gt;कंपकपाते - सरसराते उस आलिंगन में,&lt;br /&gt;ख़ामोशी के आरोह-अवरोह में,&lt;br /&gt;जो मस्त राग  हम छेड़ बैठे थें / कि /&lt;br /&gt;नसों में इठलाती-इतराती रागनियाँ,&lt;br /&gt;मानों -&lt;br /&gt;इस उदात्त मिलन के वृन्दगान सुना रही हों,&lt;br /&gt;फिर -&lt;br /&gt;कहाँ तुम - कहाँ मैं,&lt;br /&gt;कौन जाने - क्या पता,&lt;br /&gt;कितनी तुम मुझमे,&lt;br /&gt;कितना मैं तुममे,&lt;br /&gt;किसको संज्ञान - कौन बताये / कि /&lt;br /&gt;कौन किसमे कितना-कितना,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस रात -&lt;br /&gt;स्वप्न के  बिछौने पर -&lt;br /&gt;हमने देह के संगम  से आत्मा का मिलन किया था,&lt;br /&gt;कि फिर - तू नहीं - तू रही,&lt;br /&gt;कि फिर - मैं नहीं - मैं रहा,&lt;br /&gt;हम दोनों मिलकर आधा-आधा,&lt;br /&gt;एक पूरा हो गए,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस रात -&lt;br /&gt;स्वप्न के बिछौने पर -&lt;br /&gt;तुम्हारी देह एक आकाशगंगा बन  बह रही थी,&lt;br /&gt;और मैं - उसमें डूबता-उतराता बहा चला जा रहा था,&lt;br /&gt;समय की इस गतिमान परिधि में,&lt;br /&gt;हम ही उसके एक सिरे पर रुक-से गए थें,&lt;br /&gt;और - यह मान लिया था हमने कि -&lt;br /&gt;समय को हमने रोक लिया है,&lt;br /&gt;पर प्रिये - समय रुके या न रुके,&lt;br /&gt;हम तो एक-दूसरे में रुक ही गए थें,&lt;br /&gt;..........एक दूसरे में ठहर ही गए थें,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस सुबह -&lt;br /&gt;मैं मोक्ष पा चुका था,&lt;br /&gt;और तुम.........!&lt;br /&gt;       =============&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-1739350378754834154?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/1739350378754834154/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=1739350378754834154' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/1739350378754834154'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/1739350378754834154'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='.......मोक्ष तक.'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-1498906137013163427</id><published>2009-05-04T15:57:00.006+05:30</published><updated>2009-11-15T19:24:31.914+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी कहानियाँ'/><title type='text'>मेरा कथा-संसार.</title><content type='html'>&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);font-size:85%;" &gt;     &lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 153, 0);font-size:180%;" &gt;&lt;span style="color: rgb(0, 153, 0); font-weight: bold;font-size:180%;" &gt;  &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: rgb(0, 0, 0);font-size:85%;" &gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(0, 153, 0);font-size:180%;" &gt;उऋण&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(51, 51, 51);font-size:78%;" &gt;&lt;span style="color: rgb(204, 0, 0);"&gt;शहर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धनाड्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कालोनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खड़ी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकमात्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वैभव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिल्प&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कारण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शहर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समझी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt;&lt;span&gt; अन्दर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहने&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;वाले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यक्ति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कलाकौशल&lt;/span&gt;,प्रकृतिप्रेम ,&lt;span&gt;सह्रदयता&lt;/span&gt; ,&lt;span&gt;वैभव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कवि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परिचय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आस&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;पास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; अन्दर   &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गहरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निस्तब्धता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छाई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बरबस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठिठक&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विवश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;एक&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गहन&lt;/span&gt;&lt;span&gt; निस्तब्धता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भंग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टैक्सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;द्वार&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रुकी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;टैक्सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुदर्शन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नौजवान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निकला&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कदकाठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रोबदाब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt;&lt;span&gt; पता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चलता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; कि &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सेना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उच्च&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अधिकारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होगा&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;टैक्सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वापिस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेजकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नौजवान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बढा&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt;&lt;span&gt; क्षणों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठिठककर&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;खडा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहस्यमय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निस्तब्धता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मोहपाश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाँध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आकर्षक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;युवक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोठी&lt;/span&gt;&lt;span&gt; के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;द्वार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखकर&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;माली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दौडा&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;दौडा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहब&lt;/span&gt;?"&lt;br /&gt;&lt;span&gt;नौजवान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मोहपाश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुक्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोला&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रियम्बरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;?"&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;हाँ&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;साहब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रियम्बरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोठी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;आपको&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किससे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;?"&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;व&lt;/span&gt;..&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अन्दर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;?"&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;हाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सही&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आपसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलेगें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहना&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;मुश्किल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वक़्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;."&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समझ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;&lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;युवक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;इसलिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोला&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;वैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आपका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहब&lt;/span&gt;?"&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;मेरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मालिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहचानते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहचानता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ज़रूरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;."&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt;&lt;span&gt; शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जेब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिफाफा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निकला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असमंजस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिफाफा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझसे&lt;/span&gt; मिलना  &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;चाहे&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;माली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उद्यान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बैठकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अन्दर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;अन्दर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;राजस्थानी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मधुबनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शैली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सजी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बैठक&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टेपरिकार्डर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रविशंकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सितार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गूंज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वहीँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोफे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धंसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शहर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रईस&lt;/span&gt;&lt;span&gt; का शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बैठा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सामने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पैर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फैलाए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काग़जों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यस्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुनकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बिना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पलटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूछा&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;?"&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;मालिक&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नौजवान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आपसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;कह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहते&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;जी&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;&lt;/span&gt;उसने यह  &lt;span&gt;लिफाफा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मालिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt;....."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;माली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अधेड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पलटने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अधूरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;ऐनक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पीछे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रौढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आँखों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ताकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt;&lt;span&gt;  न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठंडा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गूंजा&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;लाओ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिफाफा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दो&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;माली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिफाफा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हाथों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थमा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वहीँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रुककर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अगले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदेश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रतीक्षा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिफाफे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घूम&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;फिरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खोल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अन्दर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पन्नों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिखावट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;चौँक&lt;/span&gt;&lt;span&gt; गए&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उन्होंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तेजी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पन्ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पलट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डाले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेजने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाम&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;पता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पढ़ा&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोले&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अथिति&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;कक्ष&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span&gt;ठहराओ&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;गोपाल&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाय&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;नाश्ते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रबंध&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;करे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वहीँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;माली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आज्ञा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लौट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;इधर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दृष्टि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुन्दर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिखावट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डाली&lt;/span&gt;,'&lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वर्षों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt;.....&lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसलिए&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;पत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;आदरणीय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शरत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आंखे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आई&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;सोचने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगे&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रौढ़ता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आदर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्थान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुरक्षित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;शेष&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसे&lt;/span&gt;&lt;span&gt; चूक जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बूढे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt;&lt;span&gt; संबोधित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पढ़ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगे&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आपको&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अचानक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आश्चर्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होगा&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;आश्चर्य&lt;/span&gt;...&lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गंभीर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुस्कराहट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होंठों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;बुदबुदाये&lt;/span&gt;,'&lt;span&gt;आश्चर्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहस्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उपजता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;रहस्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चमत्कार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt;  लिए &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;रहस्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चमत्कार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थीं&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वर्षों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थें&lt;/span&gt;....&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; !&lt;br /&gt;&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्यों&lt;/span&gt; ....&lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;प्रतिदिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अनजाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुर्व्यवहार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt;&lt;span&gt; न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाराज़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुईं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;सिर्फ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुप्पी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अंतर्मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेदती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;तुम्हारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निशाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अचूक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बैठा&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मैंने&lt;/span&gt;&lt;span&gt; स्वयं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उद्वेलित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाया&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अतः&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माफ़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मांगी&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहीं&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपराध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्षम्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होगा&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;मुस्कुरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठीं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्षण&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span&gt; बसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;हमेशा&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;हमेशा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;धीरे&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;धीरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;दुसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगे&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;हमे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अलग&lt;/span&gt;&lt;span&gt; ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सृष्टि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निर्माण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; प्यार  &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घरोंदे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बिखर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गए&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गईं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भटक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अर्थ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ&lt;/span&gt;&lt;span&gt; प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;जहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अवसर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलता&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इज़हार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चूकते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थें&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मित्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दीवानेपन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;हँसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करते&lt;/span&gt;&lt;span&gt; थें&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रशंसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थें&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सब&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अचानक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शब्दकोष&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पराजय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;हवा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लहराया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अतीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गलियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निकलकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वर्तमान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गये&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पढ़ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगे&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;हमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यक्ति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अलग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फैसला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूर्णता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अपना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जुड़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अन्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;भविष्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span&gt; प्रश्न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;....!&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;हाँ&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निर्णय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घंटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;." &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़बड़ाये&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वज़ह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;क्योंकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संवेदनशील&lt;/span&gt;  हुआ &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;करता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भावुकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पैर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जकड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;जीवन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सच्चाईओं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डूबा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;तुम्हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अलग&lt;/span&gt;&lt;span&gt; करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कल्पना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पीड़ादायक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;ऐसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमने&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पीड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाँट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घंटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खामोशी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डूबे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बीते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;सिर्फ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बातें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शब्द&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मानो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छिप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थें&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;उन्हीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खामोश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पलों&lt;/span&gt;&lt;span&gt; में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सदा&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सदा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीवित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रखने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;अंततः&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अलग&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;अलग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थें&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असहजता&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; कि  &lt;span&gt;पल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विश्वास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डिगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठहरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विश्वास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाकर&lt;/span&gt;&lt;span&gt; मेरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विश्वास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुममे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहुँच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहुँचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt;.....&lt;span&gt;सिर्फ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;कितना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मजबूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पढ़ा&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;तुम्हारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सपना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वायु&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सेना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्क्वार्डन&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;लीडर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;किन्तु&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डाक्टरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परीक्षा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असफल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; .&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गए&lt;/span&gt;&lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उन्हीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्षणों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वप्निल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्पर्श&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सपना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;तुमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वायु&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सेना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span&gt; भेजेगें&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाँहों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भरकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;चलो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहिए&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जल्दी&lt;/span&gt;...." &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरमाकर&lt;/span&gt; तुम्हारी  &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;बाँहों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हसँती&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;मुस्कुराती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;कितना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भोलापन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सब&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भुलाकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भावी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वायु&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सैनिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सपनें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुनने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;तुमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आग्रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;चलो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेते&lt;/span&gt;&lt;span&gt; हैं&lt;/span&gt;......"&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संवेदनाओं&lt;/span&gt;&lt;span&gt; का&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;भावनाओं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सम्मान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भावी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वायु&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सैनिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गर्भ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उतारने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तीव्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इच्छा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;और&lt;/span&gt;&lt;span&gt; शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वप्न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साकार&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकाकार  &lt;/span&gt;कर लिया था  ,&lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;चलो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शादी&lt;/span&gt;&lt;span&gt; कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;हमे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीवन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाजुक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देहरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखकर&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;वर्षों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दबे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीवन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ढेरों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रश्न&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;प्रश्नचिन्ह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनकर&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सामने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt;&lt;span&gt; खड़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पराजय&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सनातन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झुक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पराजित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;तुम्हारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धूमधाम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुनिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यस्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यस्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगे&lt;/span&gt;&lt;span&gt; थे&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहूँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जानती&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;क्योंकि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वचन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;दूसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीवन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दख़ल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; ही  &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;एक&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;दूसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जानने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोशिश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करेगें&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भविष्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रति&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुरक्षा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मनुष्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मनःस्थिति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अच्छी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरत&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सब&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाती&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एहसास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गर्भ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भावी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वायु&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सैनिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करवटें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ले&lt;/span&gt;&lt;span&gt; रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जनक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घबरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घबराहट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शक्की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ताड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.....!&lt;br /&gt;&lt;span&gt;"हाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कितना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बबेला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चरित्रहीन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परित्यक्ता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अक्षम्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपराधी&lt;/span&gt;."&lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोला&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारे&lt;/span&gt;&lt;span&gt;पूरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अस्तित्व&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;प्रश्न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सामने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अबोधता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अदालत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कटघरों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अस्तित्व&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बचाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गीता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt;&lt;span&gt; झूठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कसमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खानी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थीं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;कई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहा&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वीकार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लूँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाऊं&lt;/span&gt;...&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt;&lt;span&gt; था&lt;/span&gt;......&lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अंत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt;....!"&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शरत&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एहसान&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;ज़िन्दगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाउगीं&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अस्तित्व&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; बचा  &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नकारकर&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt;&lt;span&gt; तुमसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उऋण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाउगीं&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;बरसों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोचती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वर्ष&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समूची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुनिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समेट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बसे&lt;/span&gt;&lt;span&gt; थे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;जीवन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोराहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वैधव्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अन्धकार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt;  सपना  &lt;span&gt;चुना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वायु&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सैनिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनाउगीं&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;स्क्वार्डन&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;लीडर&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रशिक्षण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कमीशन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मैंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उससे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आर्शीवाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाए&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt;&lt;span&gt; निराश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करना&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;तुम्हारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आर्शीवाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; शायद  मैं &lt;span&gt;उऋण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाऊं&lt;/span&gt;..........&lt;span&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शुभचिंतक&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;&lt;br /&gt;ममता&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;पत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समाप्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होते&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;होते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचन्द्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आँखे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छलछला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आईं&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;सोचने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगे&lt;/span&gt;," &lt;span&gt;हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भगवान&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कैसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;परीक्षा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घडी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; सम्मुख &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;." &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठे&lt;/span&gt;&lt;span&gt; और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्क्वार्डन&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;लीडर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अथिति&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;कक्ष&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़े&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                         &lt;span style="color: rgb(204, 0, 0);"&gt;शरतचंद्र &lt;/span&gt;&lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोचने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुल्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;तुम्हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्क्वार्डन&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;लीडर&lt;/span&gt;&lt;span&gt; बनाने &lt;/span&gt;&lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सपना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;." &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहस्यमयी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुरुष&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विषय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुनता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;पहल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;मैंने&lt;/span&gt;&lt;span&gt; पूछा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कौन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहजता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उत्तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इन्सान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;इससे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ज़्यादा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt;&lt;span&gt; था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धीरे&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;धीरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूछना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रशिक्षण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुआ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रसंग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुनः&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;छेड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पैरों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झुकते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt;  ने &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कंधे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पकड़कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठाते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आर्शीवाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आओ&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पहला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अधिकार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उन्हीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आर्शीवाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span&gt; ऋण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुक्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करेगा&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;हैरान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;आखिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्यों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसलिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहस्यमय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुरुष&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बातें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कौन&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऋण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;जिसका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ढो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; और  &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;उसका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आर्शीवाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऋण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुक्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देगा&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लाख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समझ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माननी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;....&lt;span&gt;सो&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;बैठो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt;." &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गूंजा&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सम्मोहन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टूटा&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुंरत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अनजान&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;रहस्यमयी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुरुष&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चरणों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आर्शीवाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झुक&lt;/span&gt;&lt;span&gt; गया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भावुक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठे&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आँसुओं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पौछ्कर&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;यहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुनः&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निकल&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;पड़े&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उन्होंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;आर्शीवाद देते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोले&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खूब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चिरंजीवी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;भवो&lt;/span&gt;." &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कंधे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पकड़कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आँखों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सामने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोले&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;मुझसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span&gt; लम्बा&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;मुझसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुन्दर&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;मुझसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ज़्यादा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वस्थ्य&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;तुम्हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रकृति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भारतीय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वायु&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सेना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गढा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाम&lt;/span&gt;&lt;span&gt; रोशन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करो&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गर्व&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अंक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किंकर्तव्यविमूढ़&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;सा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;इतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनापन&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;इतनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भावुकता&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ममता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यक्तित्व&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाई&lt;/span&gt;&lt;span&gt; थी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वयं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्यों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भावुक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असंभव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;शरतचन्द्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span&gt; लेकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कितने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वप्न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;कितनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उत्कंठा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उत्सुकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इन्सान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संबोधित&lt;/span&gt;&lt;span&gt; करे&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समझ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुंरत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निकल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उधर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उससे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रुकने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt;&lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भावनाओं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धरातल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थें&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;महत्वपूर्ण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सपना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कितना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सकता&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाना&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;यही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt;&lt;span&gt; पास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहो&lt;/span&gt;."&lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भावुकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाया&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इंदौर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जोधपुर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कमीशन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;तब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अगले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रुक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आग्रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सका&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;रात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खाने&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यंजनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विविधता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चकित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीवन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यंजन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt;&lt;span&gt; तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; मनःस्थिति  &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उबर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; कि &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चैन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लाकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;बोले&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चैन&lt;/span&gt;&lt;span&gt; मैंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वर्षों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पैसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जोड़कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खरीदी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;शायद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt;..."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जानते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहस्यमय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुरुष&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपना&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.'&lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;संबोधन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संगीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रग&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;रग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span&gt; उतरता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुनः&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पैर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छू&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;खाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दौरान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोला&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; खाना &lt;span&gt;खाते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोलना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पसंद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करते&lt;/span&gt;&lt;span&gt; थे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;खाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काफी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पीते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोले&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;तुम्हारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुःख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठाए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;&lt;span&gt;उसने अपने जीवन &lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कठोर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कठोर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रहार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span&gt; नारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तोड़ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काफी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टूटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सबको&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुनौती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;बड़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; बस &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;यही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूँ &lt;/span&gt;कि &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुःख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देना&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उम्मीदे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टिकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मदद&lt;/span&gt;&lt;span&gt; नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;यहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मदद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ली&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुनकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चौका&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अगर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इनसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मदद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऋण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुक्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समझ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt;&lt;span&gt; था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुरुष&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विचित्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संबंधों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उलझकर&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;वही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थे&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिस्से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ढेरों&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;दुःख&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;उलहाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;सुख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिर्फ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हाथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अपना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वैधव्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt;&lt;span&gt; चुपचाप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वीकार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;तुम्हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आशा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;केंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;दुखो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लड़ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसमे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अद्भुद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शक्ति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोचता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगता&lt;/span&gt;&lt;span&gt; है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;थोडी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रुका&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;जैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गहरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विस्मृत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अवसाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ढक्कन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसमें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डूबता&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;जा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डूबी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt;&lt;span&gt; आवाज़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उभरी&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुःख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहुँचाना&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;ममता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुलारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मनप्राण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कातरता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नतमस्तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बचपन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखा&lt;/span&gt; था  &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ससुराल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अत्याचार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रतिकार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;सब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुपचाप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सहती&lt;/span&gt;&lt;span&gt; रही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्षण&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;पति&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बरसता&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;गरजता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्षण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्षण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वैधव्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt;&lt;span&gt; बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गहरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;जान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जुट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वयं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वादा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुःख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसका&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;&lt;/span&gt;उसके सारे  &lt;span&gt;सुख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होगें&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt;&lt;span&gt; वादा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहस्यमय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुरुष&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;अचानक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हाथों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विचित्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संबंधों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पहेली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिस्सा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अनजाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्षण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चकित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt;&lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;."&lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt;....?" &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उथल&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;पुथल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रोमांचित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठा&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;कितना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पवित्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सम्बन्ध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहुत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अबूझ&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;जिसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समझने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोशिश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सका&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भावुकता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उभरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बालसुलभ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जिज्ञासा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साथ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पढाई&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;प्रशिक्षण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अदि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूछता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अरु&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt;&lt;span&gt; मानो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सम्मोहन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बंधा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उत्तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सिलसिला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अबाध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चलता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहता&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;यदि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नौकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गोपाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्हें&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt;&lt;span&gt; नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूछता&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;बिस्तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोचता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विषय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बताया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्होंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;रात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बिजनेस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt;&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोटा&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साम्राज्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;शादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पहली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बच्ची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पत्नी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रही&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोटी&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;नन्ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बच्ची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगाये&lt;/span&gt;&lt;span&gt; वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीवन&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;यात्रा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;कई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बच्ची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हवाला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूसरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तैयार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऐसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निर्बाध&lt;/span&gt;&lt;span&gt; रूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जीवन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यतीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नन्ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बच्ची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बड़ी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;बड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसका&lt;/span&gt; - उत्तरा .&lt;span&gt;हाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छुट्टियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नानी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt;&lt;span&gt; है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आएगी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिलवाऊगाँ&lt;/span&gt; ."&lt;span&gt;यही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उन्होंने&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुनकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रोमांचित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;छोटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहन&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                   &lt;span style="color: rgb(204, 0, 0);"&gt;जब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुसरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोपहर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भोजन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चलने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;द्वार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विदा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हाथों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चेक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थमा&lt;/span&gt;&lt;span&gt; दिया&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पूरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ग्यारह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लाख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चेक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;हतप्रभ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अनायास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुहँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निकला&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;?"&lt;br /&gt;&lt;span&gt;मुस्कुराते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोले&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेंट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;जिसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिचक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाहिए&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;&lt;span&gt;माँ से&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूछे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बगैर&lt;/span&gt; ...."&lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिचकिचाया&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;उसकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काटकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोले&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेंट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ममता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;और&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेंट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होनहार&lt;/span&gt;&lt;span&gt; स्क्वार्डन&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;लीडर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt;."&lt;span&gt;फिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वह&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;भावुक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोले&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हजारों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सपनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सपना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;जिसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाए&lt;/span&gt;&lt;span&gt; हैं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बनाये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रखने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;वैसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समूची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुनिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोगों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोड़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाउगां&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;केवल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span&gt; छोटी&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेंट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चुप्पी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समझ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुविधा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;यहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ऋण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चढ़&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उतर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt;&lt;span&gt;है&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;वह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समझ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;कितना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विचित्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सब&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;सच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लोग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहस्यों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;यहाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोटी&lt;/span&gt;&lt;span&gt; बहन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;जिसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैंने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;जिसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जानता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बहन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शब्द&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मानो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नस&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;नस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उतरता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;कहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt;&lt;span&gt; बुरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;मान &lt;/span&gt; &lt;span&gt;जायेगी&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हमेशा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अजनबियों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुछ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अजनबी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जैसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt;&lt;span&gt; अक्सर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;बड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इन्सान&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बंधन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बांध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिया&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझे&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करूँ&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अपनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;&lt;span&gt;विचारों की&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span&gt;श्रृंखला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाहर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt;&lt;span&gt; बोला&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;अच्छा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चलता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हूँ&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;हाँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेटा&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहना&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;मालिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खुश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखा&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;जितना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुम्हारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाद&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;."&lt;span&gt;सहसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खड़ा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पड़ा&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;"&lt;span&gt;देखो&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;भगतराम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;समर्थन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt;."&lt;span&gt;हसँते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हुए&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;बोले&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुनः&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झुककर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाँव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छू&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिए&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;थोडी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दोनों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आलिंगनबद्ध&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खड़े&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहे&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आलिंगन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पूर्ण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपनापन&lt;/span&gt;&lt;span&gt; महसूस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;था&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;कार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिशिर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेकर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गई&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span&gt;शरतचंद्र&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अपने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गहराइयों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;में&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गए&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;अतीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कितने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पल&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;कितनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्मृतियाँ&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;कितने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुख&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;दुःख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मथने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लगे&lt;/span&gt;,&lt;span&gt;कार&lt;/span&gt; &lt;span&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span&gt; आँखों&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ओझल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देख&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बरबस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उनके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुहँ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;से&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निकल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गया&lt;/span&gt;,"&lt;span&gt;ममता&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तुम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुझसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उऋण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गईं&lt;/span&gt;.&lt;span&gt;पर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अब&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मैं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुमसे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कभी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उऋण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नहीं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हो &lt;/span&gt;&lt;span&gt;सकूँगा&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                   =================== &lt;span&gt;समाप्त&lt;/span&gt; =================&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;         &lt;/span&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-1498906137013163427?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/1498906137013163427/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=1498906137013163427' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/1498906137013163427'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/1498906137013163427'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/05/blog-post_04.html' title='मेरा कथा-संसार.'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-1670182307365454812</id><published>2009-04-27T23:54:00.003+05:30</published><updated>2009-11-15T19:25:04.075+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी कहानियाँ'/><title type='text'>मेरा कथा-संसार.</title><content type='html'>&lt;span&gt;&lt;span style="font-style: italic; color: rgb(255, 204, 51);font-size:100%;" &gt;&lt;span style="color: rgb(204, 0, 0);"&gt;(कहानी)&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;      &lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);font-size:130%;" &gt;&lt;span style="font-family:trebuchet ms;"&gt; &lt;span style="color: rgb(204, 51, 204);"&gt;अर्चना&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 51, 255);font-size:130%;" &gt;वो&lt;/span&gt; सुबह ,शायद अन्य सभी सुबहों से कहीं अलग थी,जब जलज को जीवन के रेगिस्तान में एक नखलिस्तान के दर्शन हुए थे.जलज के लिए वह सुबह भी उसके जीवन के बीते चौबीस सालों की तरह ही गुजर जाती यदि उसे उस दिन सुबह वह सांवली-सी लड़की कोटरा के बस-स्टाप पर नहीं मिलती.कंधे पर स्कूल बेग लटकाए,गहरी काली आँखों से उसने जलज को देखना शुरू किया तो जलज को लगा कि मानों वह उसके अन्दर कुछ ढूंढ़ रही हो और फिर जैसे वह सांवला उसमें ही खोने लगा हो और जलज भी, जो पहले तो थोड़ा असहज महसूस कर रहा था,वह भी उसमें कुछ खोजने लगा.उसका धड़कता मन कहने लगा,"जलज यही है तेरा प्यार."&lt;br /&gt;फिर तो सब यंत्रवत-सा हुआ.कब बस-स्टाप पर बस आई और कब वह दोनों उसमें चढ़े,उन्हें पता ही नहीं चला और कब जवाहर चौक आ गया और..... ! जलज को जाना था कहीं और और वह पँहुच गया उस सांवली-सलोनी के स्कूल.यह भी कैसे हुआ और कब हो गया यह भी पता नहीं चला.फिट तो यह सिलसिला चल पड़ा.जलज रोज़ कतरा के बस-स्टाप पर पँहुच जाता,फिर दोनों वहीँ से बस में चदते और फिर एक-दुसरे को देखते-देखते सफ़र तय कर डालते.&lt;br /&gt;फिर सुबह आई,फिर शाम आई,फिर सुबह आई,फिर शाम आई,फिर सुबह....फिर शाम....! आखिर एक दिन दोनों का परिचय भी हुआ.दोनों मुस्कुरा भर दिए.नाम के अलावा और क्या परिचय हो सकता था,फिर मिले भी कुल दो-चार सेकेण्ड थें.हर समय धीर -गंभीर  बनी रहने वाली वह आज ही तो मुस्कुराई थी.अब हर सुबह जलज कोटरा बस-स्टाप पर होता और शाम उसकी यादों के साथ होता.जलज हमेशा हर काम में ध्यैर्य रखने वाला,उस दिन शाम को उसे अकेला पाकर,अपने को संभल नहीं पाया,बोल उठा."अर्चना....मैं तुमसे प्यार करता हूँ.....!"&lt;br /&gt;और वह लड़की,वो अर्चना,विधायक आवास गृह के पास फुटपाथ पर मानो उसकी फर्शियां गिनती हुई चल रही हो.पल भर के लिए उसकी गहरी-काली आँखें उठी और फिर झुक गई उन्हीं फर्शियों पर.कोई उत्तर नहीं दिया और कोई उत्तर न पाकर जलज और धड़क उठा,और असहज हो उठा.पर सिलसिला यहीं नहीं रुका.कभी  उन फर्शियों को गिनते-गिनते,कभी जवाहर चौक से नेहरु नगर तक बस और टेंपो के चक्करों जलज कहीं न कहीं प्यार के धागों में मोती के मनकों की तरह उलझ गया था.और उधर वो अर्चना भी.....पता नहीं,वो तो चुप ही थी.जलज जान नहीं पा रहा था कि  उसकी धड़कनों में भी वो तूफान उमड़  रहा है या नहीं जो उसका जीना मुश्किल किये हुए है.हर बार जलज मौका पाकर कहता,"अर्चना, मैं तुमसे प्यार करता हूँ." हर बार अर्चना चुप रह जाती.&lt;br /&gt;जलज प्रति दिन अपना धड़कता मन लेकर घर से निकलता और धड़कता मन लेकर ही लौट आता.सोचता,यह अर्चना किस दिन मुझसे कहेगी,"हाँ जलज...मेरे जलज....मैं भी तुमसे उतना ही प्यार  करती हूँ,जितना कि तुम मुझे...."इस तरह जलज अर्चना के सपने देखता और सपने में अर्चना को देखता.हर वक़्त उसकी यादों-उसकी  कल्पनाओं  में खोया-खोया रहता.कल्पना और सपनों के धरातल पर नित्य नये सपने बुनता रहता-नई बातें करता रहता.उसे लगता,क्या अर्चना भी सपने में मुझे देखती होगी ?यूँ तो करने को ढेरों बातें थी करने को उसकी जिंदगी में,पर अब मनो सब अस्त-व्यस्त हो गया हो.क्या प्यार के आगे दुनिया कुछ भी नहीं है?&lt;br /&gt;एक दिन - एक सुबह हजारों बार की तरह जवाहर चौक पर जलज कह उठा,"सुनो अर्चना, मैं तुमसे प्यार करता हूँ."&lt;br /&gt;पहली बार अर्चना बोली,"एक ही वाक्य हज़ार बार कहने से क्या अर्थ है?"&lt;br /&gt;"ताकि तुम भी कहो की जलज मुझे भी तुमसे प्यार है."&lt;br /&gt;वह हंस पड़ी,"कभी आईने में अपनी सूरत देखी है?"&lt;br /&gt;अधीर जलज ने कहा,"हाँ अर्चना, तुम्हारी इन गहरी काली आँखों में मैंने कई बार अपने को देखा है.अब तुम कभी आईने के सामने कड़ी होकर देखना,अपनी ही इन गहरी काली आँखों में झाँकना,,,,तुम मुझे वहीँ पाओगी."&lt;br /&gt;"..........................."&lt;br /&gt;"तुम अब चुप क्यों हो गई अर्चना...."&lt;br /&gt;"तुम्हारे इस पागलपन का क्या जबाब दूँ,यही सोच रही हूँ."&lt;br /&gt;धड़कते मन वाले जलज ने कहा,"कुछ मत सोचो......कोई जबाब मत दो.बस मुझे इतना भर बता दो कि तुम मुझसे प्यार करती हो,बिलकुल वैसे ही जैसे मैं कह देता हूँ."&lt;br /&gt;अर्चना चिहुंक उठी,"मैं क्यों करूँ तुमसे प्यार.क्या तुम्हे कोई और लड़की नहीं मिली?"&lt;br /&gt;हवा में मुक्का-सा लहरता हुआ जलज बोला,"हाँ, बहुत सी लड़कियां मिली,पर उनमें से किसी के पास भी तुम्हारी तरह गहरी काली आँखें नहीं थीं,उनमें से कोई भी अर्चना नहीं थी."&lt;br /&gt;"तो ढूंढ़ ली,ऐसी लड़की तो कहीं भी मिल जायेगी."&lt;br /&gt;"अब मैं तुमसे आगे नहीं जाना चाहता हूँ."जलज ने धीर-गंभीर स्वर में कहा.&lt;br /&gt;"तो मत जाओ....पर इतना जन लो कि मैं भी तुमसे प्यार नहीं करती हूँ."&lt;br /&gt;यह सुनकर जलज आहत हो गया,फिर उसी आहत मन से बोला,"अच्छा चलो तुम मुझसे प्यार मत करना......कभी मत करना.पर अर्चना, मेरी इस बीती-ताहि ज़िन्दगी में केवल एक ही इच्छा है कि तुम मुझे प्यार  करो...पल भर के लिए ही...झूठा ही सही.....पर मुझे प्यार करो.बस एक बार सिर्फ झूठमूठ ही सही,पर मुझे प्यार करो अर्चना,इससे आगे मेरी और कोई इच्छा  नहीं है."&lt;br /&gt;"............."और फिर मानो अर्चना के पास कहने को कुछ भी नहीं रह गया हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);font-size:130%;" &gt;उस &lt;/span&gt;शाम सूरज बहुत ही तन्हा होकर डूब गया.जलज बड़े तालाब के किनारे खडा-खडा उसे डूबता हुआ देखता रहा.देखता रहा और सोचता रहा कि क्या अर्चना उससे सचमुच प्यार नहीं करती है.क्यों प्यार नहीं करती है,क्या कमी है उसमें.क्या अर्चना उसे एक झूठा पल भी नहीं दे सकती है,वह पल जिसे पाकर वह तृप्त हो जायेगा-कृतार्थ हो जायेगा......शायद यही उसका मोक्ष भी हो.&lt;br /&gt;सोचते-सोचते बड़े तालाब के किनारे रह गया लहरों का करतल और उसका उदास मन.और रह गए जीवन के ढेरों प्रश्न,जिनका उत्तर वह ढूंढ़ नहीं पाया था या उत्तरों की उन टेडी-मेढ़ी पगडंडियों में कहीं उलझकर रह गया था.क्या प्यार म कोई असफल होता है.....लहरों का करतल वहीँ छोड़कर जलज अपना उदास मन लिए घर लौट चला.&lt;br /&gt;जलज,वह पागल फिर सपने बुनने लगा.पल-दर-पल....अनगिनत पल तो जलज ने सपने देखकर ही गुजार दिए.वह नियमित रूप से जवाहर चौक पहुंचता,फिर बस या टेंपो से कोटरा तक.कोशिश करता कि अर्चना उसके सामने ही बैठे और ऐसा होता भी,वह भी उसके सामने ही आकर बैठती.कभी वह उसे देखता और कभी अर्चना अपनी गहरी काली आँखों से उसे देखती.कभी दोनों इतने क़रीब होते कि जलज को लगता कि अभी अर्चना का हाथ पकड़कर चूम ले-कभी इस तरह क़रीब होते कि साँसों से साँसें टकराती-सी महसूस होती और जलज को लगता कि वह उसके भाल पर एक चुम्बन टाँक दे और जिस एक झूठे पल की प्रतीक्षा में जी रहा है उसे यूँ ही सही-जबरदस्ती ही सही पर सचमुच जी ले.&lt;br /&gt;उसने फिर कई बार अर्चना  को उस एक पल की याद दिलाई,पर हर वह हँसकर टाल जाती,कहती,"ऐसी भी जल्दी क्या है,सोचो,अगर वो पल आया तो उस पल को गुजरते हुए कितना समय लगेगा.फिर क्या करोगे?"&lt;br /&gt;जलज कहता,"तब मैं उस पल को अपनी मुठ्ठी  में क़ैद कर लूगाँ,ऐसे....." और फिर वह मुठ्ठी बनाकर दिखता.&lt;br /&gt;अर्चना हँस पड़ती,"मुठ्ठी में रेत और छन्नी में पानी  ठहरा है कहीं आज तक जो तुम यह सब करने चले हो.पागलपन है यह.अपना पागलपन कम करो.ऐसा कहीं होता है?"&lt;br /&gt;जलज भी पलट कर कहता,"अरे अर्चना तुम मुझसे प्यार तो करो,मैं तुम्हे मुठ्ठी में रेत और छन्नी में पानी भी ठहराकर दिखाऊगाँ."&lt;br /&gt;"पर वह पल तो झूठा होगा."&lt;br /&gt;"झूठा ही सही,पर तुम मुझसे प्यार तो करो."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(51, 102, 255);font-size:130%;" &gt;ऐसे&lt;/span&gt; ही जब अंगड़ाईयों पर अंगड़ाईयाँ लेते हुए मौसम पर मौसम बीत चले,तब एक स्वर्णिम सुबह के बाद.....एक सुनहरी श्यामल शाम के बाद,जब चिर-प्रतीक्षित धड़कती सुहागरात आई तो,जलज ने अर्चना का घूँघट उठाकर कहा,"चलो,आज तुम मुझे पल भर के लिए ही सही,झूठा ही सही,पर प्यार करो....."&lt;br /&gt;अर्चना का सर्वांग लजा उठा,वह जलज के इस तरह छेड़ने पर बोली,"जलज,वह झूठा पल मेरी ज़िन्दगी में न पहले कभी आया था और न ही कभी आएगा."&lt;br /&gt;"क्यों....?"जलज ने आश्चर्य से पूछा.&lt;br /&gt;"क्योंकि झूठा प्यार पाने की-करने की तुम्हारी इच्छा थी और मैं,यदि मुझे किसी से प्यार करना ही है तो मैं उसे झूठा प्यार क्यों करूँ...." अपनी उन्हीं गहरी काली आँखों से,जिसमें जलज डूबा हुआ था,जलज की प्यार भरी-प्रश्न भरी आँखों में झाकते हुए अर्चना बोली,".........उसे सचमुच ही प्यार करूँ न.जलज....."&lt;br /&gt;"........"&lt;br /&gt;"जलज....."&lt;br /&gt;"हूँ.......!"&lt;br /&gt;"जलज,मैं तुमसे प्यार करती हूँ....."अर्चना लाज से और सिमट गई यह कहकर.&lt;br /&gt;फिर आने वाले कई पल चुप,गुपचुप गुजरे,पर खाली नहीं.आज जलज के सामने था एक आश्चर्य,वही शब्द,वही शब्द,वही आवाज़,वही अंदाज़,वही चेहरा.....जिसकी उसे न जाने कितने युगों से प्रतीक्षा थी,जिसका वह आराधक था.उसका वही प्यार,वह पल भी अब किसी एक पल के लिए नहीं वर्ण जन्म-जन्मान्तर के लिए उसके पास थें,उसके अपने बनकर.कोई प्यार क्यों करता है,मुठ्ठी में रेत या छन्नी में पानी जमता है या नहीं.....अब जलज और अर्चना दोनों ही इन सवालों से बहुत दूर थें.सितारों भरी-चांदनी से नहाकर आई इस गुजरती रात में गुजरते चुप पलों की चुप्पी तोड़ते हुए जलज बोला,"अर्चना......"&lt;br /&gt;"हूँ बोलो......"&lt;br /&gt;"अर्चना....."&lt;br /&gt;"हूँ..........."&lt;br /&gt;"अर्चना......"&lt;br /&gt;"..............."&lt;br /&gt;"................"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: rgb(204, 51, 204);font-size:130%;" &gt;फिर&lt;/span&gt; सुबह होने तक दोनों प्रेमी चाहकर भी कुछ न कह सके.&lt;br /&gt;      &lt;span style="font-weight: bold; color: rgb(153, 153, 255);"&gt;           ----------------------&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-1670182307365454812?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/1670182307365454812/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=1670182307365454812' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/1670182307365454812'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/1670182307365454812'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='मेरा कथा-संसार.'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-3802062213284919373</id><published>2009-03-31T00:09:00.003+05:30</published><updated>2009-11-15T19:21:38.534+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारतीय सिनेमा और मैं'/><title type='text'>हिंदी की दस सर्वश्रेष्ठ क्लासिकल फिल्में......</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आज&lt;/span&gt; मैं बात कर रहा हूँ हिंदी की दस सर्वश्रेष्ठ क्लासिक फिल्मों की.यह वो फिल्में हैं जिन्हें देखना एक सुखद  अनुभव होता है और बार-बार देखने की इच्छा बनी रहती है.और यदि बार-बार देखने को न मिले तब भी यह फिल्में आपके अंतर्मन में चलती ही रहती हैं और जब भी फिल्म की शास्त्रीयता की बात होती है तो इन्हीं चंद फिल्मों का नाम ज़ुबान पर आता है.इन्हें आप फिल्मों का जादू भी कह सकते है और यदि फिल्मों को परिभाषित करना हो तो तब भी यही फिल्में सामने आती हैं.फिल्मों का यदि कोई स्कूल हो तो तब भी वो यही फिल्में होगीं जो उस स्कूल का प्रतिनिधित्व करेगीं.&lt;br /&gt;एक शास्त्रीयता में ढली-रची-बसी यह फिल्में,सुन्दर-सुघड़ सौन्दर्य का जीवंत उदहारण प्रस्तुत करती हैं.फ्रेम-दर-फ्रेम फिल्म कुछ यूँ आगे बढती हैं कि देखनेवाला अपने को भूलने लगता है और जब फिल्म ख़त्म होती है तो वह उसके जीवन का स्थाई भाव बन जाती है.उसे लगता है कि वह फिल्म देखकर नहीं वरन उसे जीकर आ रहा हो या उसे लगता है कि अरे यह तो उसी पर बनी है,उसी के परिवेश की बात कह रही है.कितना सच कहा गया है,कितना अपनापन है,कितना आंदोलित करती है,हाँ समाज को बदलना ही होगा.अब यह सब नहीं चलेगा.ऐसी ढेर सारी बातें उस देखने वाले के मनो-मस्तिष्क में चलती ही रहती हैं.यह फिल्में एक अलग छाप छोड़ती हैं.&lt;br /&gt;क्या ऐसी कोई फिल्म आपको याद आ रही है,क्या कहा हाँ......पता नहीं.....नहीं.....,चलिए मैं ही बताये देता हूँ.मैंने हिंदी फिल्मों की दस सर्वश्रेष्ठ क्लासिक फिल्मों की सूची तैयार की है,जो आज भी अपनी एक अलग जगह रखती हैं और एक फिल्म बनाने वाले के लिए यह फिल्में आज भी एक श्रध्दा का भाव रखती हैं और एक ऐसी क्लासिक देने की चाह उस हर व्यक्ति के मन में होती है,जो कहीं-न कहीं फिल्म के निर्माण-निर्देशन से जुड़ा हुआ है.प्रस्तुत है यह सूची -&lt;br /&gt;१. &lt;span style="font-size:130%;"&gt;अछूत कन्या&lt;/span&gt; -&lt;br /&gt;अपने दौर की बाम्बे टाकीज की वो क्लासिक है,जिसका जबाब आज भी कहीं नहीं है.&lt;br /&gt;२. &lt;span style="font-size:130%;"&gt;आदमी &lt;/span&gt;-&lt;br /&gt;व्ही.शांताराम की सबसे क्लासिक कृति है यह फिल्म और अपने दौर की एक बोल्ड प्रेम कहानी भी है.&lt;br /&gt;३ &lt;span style="font-size:130%;"&gt;झाँसी की रानी&lt;/span&gt; -&lt;br /&gt;सोहराब मोदी का ऑपेरा,पारसी थियेटर की शैली,इस जादू का आज भी तोड़ नहीं है.इतिहास की ऐसी प्रस्तुति आज संभव नहीं है.&lt;br /&gt;४. &lt;span style="font-size:130%;"&gt;दो बीघा ज़मीन&lt;/span&gt; -&lt;br /&gt;यह फिल्म उस दौर में जितनी जीवंत थी,आज उससे कहीं ज़्यादा जीवंत है.प्रगति के तमाम पायदानों के ऊपर बैठे हुए हम लोगों के नीचे आज भी असंख्य लोगो के लिए दो बीघा ज़मीन के लिए संघर्ष वैसा का वैसा ही है&lt;br /&gt;५. &lt;span style="font-size:130%;"&gt;जागते रहो&lt;/span&gt; -&lt;br /&gt;आरके की यह फिल्म.सिर्फ़ फिल्म ही नहीं समाज का आइना भी है,जो आज भी वैसा ही है.बल्कि आज तो यह आइना और भी कारपोरेट हो गया है.&lt;br /&gt;६.&lt;span style="font-size:130%;"&gt; बंदिनी&lt;/span&gt; -&lt;br /&gt;नहीं देखी हो देख लें और प्रेम की पावन उत्कंठा को अपनी आत्मा तक महसूस करें.मैं विश्वास दिलाता हूँ कि इस प्रेम की बेकरारी आप अपने लिए भी चाहेगें.&lt;br /&gt;७. &lt;span style="font-size:130%;"&gt;देवदास&lt;/span&gt; -&lt;br /&gt;के.एल.सहगल और दिलीप कुमार दोनों जैसे एक ही धारा के दो रूप हों,जैसे एक राग-दो रागनियाँ हों.&lt;br /&gt;८. &lt;span style="font-size:130%;"&gt;तीसरी कसम&lt;/span&gt; -&lt;br /&gt;जीवन कितना भोला और मासूम हो सकता है कि हम सब हीरामन हो जाना चाहेगें.&lt;br /&gt;९. &lt;span style="font-size:130%;"&gt;साहब-बीवी और गु़लाम&lt;/span&gt; -&lt;br /&gt;इस फिल्म की विशेषता यही है कि इस पर बोलना-लिखना आसान लगता है,पर है  मुश्किल.पर गुरुदत्त का ही हो जाने का जी चाहता है.करीब १३०० पन्नों के उपन्यास को तीन घंटे के रूपक में बदल देना और वो भी मूल कहानी और उसकी आत्मा से बिना छेड़छाड़ किये हुए अदभुद है अदभुद.&lt;br /&gt;१०. &lt;span style="font-size:130%;"&gt;शतरंज के खिलाडी&lt;/span&gt; -&lt;br /&gt;प्रेमचंद की कलम का जादू तो है ही पर सत्यजीत राय का जादुई स्पर्श इस कहानी को इतिहास में बदल देता है.&lt;br /&gt;मैं जानता हूँ कि सिर्फ़ दस फिल्मों को इस तरह शामिल करना स्वयं के साथ ही नहीं सिनेमा की रचनाधर्मिता के साथ भी अन्याय ही है,पर यह तो शुरुआत भर है.उक्त सूची को पढ़कर आपके ज़ेहन में भी ऐसी कई फिल्मों के नाम चलचित्र की तरह उभर रहे होगें जो इस सूची में शामिल नहीं हैं, पर आप उन्हें मुझसे शेयर कर सकते हैं.&lt;br /&gt;आज इतना ही,&lt;br /&gt;शेष फिर......!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-3802062213284919373?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://www.blogger.com/post-create.g?blogID=7041037367458600105' title='हिंदी की दस सर्वश्रेष्ठ क्लासिकल फिल्में......'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/3802062213284919373/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=3802062213284919373' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/3802062213284919373'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/3802062213284919373'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/03/blog-post_31.html' title='हिंदी की दस सर्वश्रेष्ठ क्लासिकल फिल्में......'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-7167630204408994627</id><published>2009-03-27T15:02:00.003+05:30</published><updated>2009-11-15T19:20:46.733+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारतीय सिनेमा और मैं'/><title type='text'>सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्में...</title><content type='html'>मित्रों, मैं पिछले दिसम्बर से 100 सबसे ज़्यादा देखे जाने वाली हिंदी फिल्म्स् की सूची बनाने में लगा हुआ हूँ.और पिछले तीन माह का अनुभव बताता है कि यह सूची 100 से ऊपर भी जा सकती है,पर मैं एक अनुशासन बनाये रखने को प्रतिबद्ध हूँ.अभी जब संजीव सारथीजी का ब्लॉग पर लेख पढ़ रहा था तो मुझे लगा की मेरे जैसे और भी लोग हैं जो इस तरह के कार्य में संलग्न हैं.यह अच्छी बात नहीं,वरन बहुत ही सुखद बात है. हिंदी सिनेमा ने हमे बहुत गहरे तक छुआ है और यही वह सिनेमा है जो हिकारत की नज़रों से भी देखा गया है.मुझे अक्सर सुनने को मिलता रहा है कि तुम जैसे लेखक को-बुद्धिजीवी को सिनेमा पर नहीं लिखना चाहिए.मैंने उनसे पूछता हूँ कि क्या हिंदी सिनेमा इतना दोयम दर्ज़े का है कि उस हम जैसे लोगों को बात नहीं करना चाहिए,तो फिर उन असंख्य दर्शकों का क्या,क्या वह भी दोयम दर्ज़े के हैं.क्या दोयम दर्ज़े के लोगों द्वारा दोयम दर्ज़े के लोगों के लिए ही सिनेमा है? अगर ऐसा है तो फिर आस्कर की और हम सब इतना लालायित क्यों हो जाते हैं.क्यों सब के सब इतना बौरा जाते हैं कि आस्कर दुनिया का सबसे बड़ा सच हो जाता है?&lt;br /&gt;पर ऐसा है नहीं और तथाकथित-कतिपय लोगों को ऐसा लगता भी है तो यह उनकी अपनी समस्या है.मुझे तो सिनेमा से प्यार है और वह भी अव्वल दर्ज़े का.तो बात हो रही थी सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म्स् कि तो सारथीजी के लेख में जिन फिल्म्स् का नाम है,उनमें से मैं एक फिल्म."हम आपके हैं कौन" को छोड़कर बाकी सभी पर सहमत हूँ.अंत में विनोदजी ने एक समीक्षक की पसन्द की जिन फिल्म्स् की सूची दी,वह सभी ऐसी फिल्म्स् हैं,जिनके बारे में मेरा मत यह है कि जिसे भी फिल्म्स् की ज़रा-सी भी समझ हो और लिखने का हुनर तथा कला के प्रति अनुराग-आग्रह,वह इन फिल्म्स् को जगह देगा ही. इनमें भी "नीचा नगर" को हम विश्व-सिनेमा की कालजयी कृति कह सकतें हैं.यहाँ में एक और नाम जोड़ना चाहूगां,"दो बीघा ज़मीन". "बायसिकल थीफ" जो सम्मान विश्व-सिनेमा में हासिल है,"दो बीघा ज़मीन" उससे कहीं ज़्यादा सशक्त कृति है."गर्म हवा" अपना जो विशेष प्रभाव छोड़ती है,वही विशेष प्रभाव हम एक लम्बे गेप के बाद "पिंजर" में भी महसूस करते हैं.अपने सशक्त अभिनय से उर्मिला मार्तोंडकर फिल्म-इतिहास में अपना पन्ना जोड़ने में सफल रहीं हैं.लेकिन ध्यान रहे की फिल्म्स् की समीक्षा और समीक्षक फिल्म्स् अलग-अलग चीजें हैं.अंतर बहुत बड़ा नहीं है,बस रेशम और कोसा जैसा है.यहाँ भी प्रश्न खड़े किये जा सकते हैं कि आखिर कौन-सी फिल्म्स् समीक्षा के लिए हैं और समीक्षक की फिल्म्स् कौन-सी हो सकती हैं.मेरे लिए दस सर्वश्रेष्ठ फिल्म्स् चुनना थोडा मुश्किल काम होगा,हाँ दस-दस श्रेष्ठ फिल्म्स् की दस अलग-अलग सूचियाँ बना सकता हूँ.फिलहाल मेरी पहली सूची कुछ यूँ होगी -&lt;br /&gt; १. अछूत कन्या,&lt;br /&gt;२. दुनिया न माने,&lt;br /&gt;३. आवारा,&lt;br /&gt;४. मदर इंडिया.&lt;br /&gt;५.मुझे जीने दो,&lt;br /&gt;६. गाइड,&lt;br /&gt;७.पाकीजा,&lt;br /&gt;८.बाबी&lt;br /&gt;९.शोले,&lt;br /&gt;१०.जाने भी दो यारों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- शेष फिर.....!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-7167630204408994627?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/7167630204408994627/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=7167630204408994627' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/7167630204408994627'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/7167630204408994627'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/03/blog-post_27.html' title='सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्में...'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-2092176816561472294</id><published>2009-03-22T22:45:00.001+05:30</published><updated>2009-11-15T19:16:10.529+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;पल-प्रतिपल&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt; (अंतिम भाग)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;फाल्गुन माह की वह सुबह.उस दिन अर्चना का अंतिम प्रश्न-पत्र था.मैं सुबह से ही घर से उससे मिलने के निकल गया था.तब मेरे चेतन में ढ़ेरों बातें - अचेतन में ढ़ेरों स्वप्न और इनके बीच मैं,उन्हीं प्रश्नों के साथ  जिन पर मैं कई दिनों से विचार कर रहा था.अपने को मथ रहा था.इस मंथन में गरल मिलेगा या अमृत,पता नहीं,पर आज मैं उससे मिलकर यह सब स्पष्ट कर लेना चाहता था.आखिर वह क्या चाहती है,यह जानना भी ज़रूरी था.अन्यथा हम यह संबंध अनावश्यक क्यों ढोए.यवनिका यदि उठनी ही नहीं है है तो फिर पटाक्षेप ही सही.पर इतनी सुबह-सुबह घर से निकलने पर भी अर्चना से मुलाक़ात नहीं हो पाई.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"पाषाणों को पूजा नहीं हमने, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;लाँघ गए उन्हें जीवन-पथ जान, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;कितना विष भरा हुआ,हुए नहीं अमृत हम, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span class=""&gt;                                   अरे&lt;/span&gt; यायावर हम......"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अब यदि स्वयं की मानसिकता की बात कहूँ तो गत जुलाई से आज तक हमारे प्रेम के सफ़र जितनी भी बाधाएं आई थीं, वह सब अर्चना के द्वारा ही खड़ी की गईं थीं,बाहर का तो कोई भी व्यक्ति हमारे बीच में नहीं था और आया भी नहीं था.हालाँकि अर्चना हमेशा यही कहती थी कि उसकी बहनें इस संबंध के खिलाफ़ हैं और वह लोग मिलकर उस पर यह संबंध तोड़ देने के लिए दबाब डालते रहते हैं. पर अर्चना, यह बामनिया की बात थी,यहाँ तो तुम पूरी तरह स्वतंत्र थीं.तुम्हें ही अपने जीवन के सारे निर्णय भी स्वयं ही लेने थें,पर फिर हुआ क्या,क्या सोचा है आज तक तुमने स्वयं के बारे में-हमारे संबंधों के बारे में.तुम्हारे मन की तो मैं नहीं कह सकता,पर अपने मन की बात तो कह ही सकता हूँ,एक कड़वा सच और वो कड़वा सच यह है कि आज मैं तुमसे शादी करने की मानसिकता में नहीं हूँ.प्रेम के लिए मैं न तो कोई सौदेबाजी कर सकता हूँ और न ही कोई समझौता कर सकता हूँ और फिर अर्चना तुमने कभी मेरे प्रेम को वह सम्मान दिया ही कहाँ हैं,उसे स्वीकार किया ही कहाँ है.फिर सारी बातें तो बेमानी ही हैं.&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;     फिर&lt;/span&gt; भी मैंने निर्णय पूरी तरह से अर्चना के ऊपर ही छोड़ दिया था,यदि आज-कल वह मुझसे शादी के लिए तैयार होती है तो मैं भी तैयार हूँ.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"हुआ ही नहीं है,कोई बयां ऐसा अभी, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;कि ऐ ख़ुशी तुम,मिला करोगी हमें कभी-कभी"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अर्चना ने मुझे देख,मेरे साथ कालेज के द्वार तक आई.सबसे पहले उसने मुझसे अपने घर के विषय में पूछा,मैंने अनभिज्ञता प्रगट कर दी.मैंने उससे कहा,"चलो चलते हैं,रास्ते में बातें करेगें."&lt;br /&gt;वह लगभग टालने वाले अंदाज़ में बोली,"नहीं,अभी मुझे मेरी एक सहेली के साथ जाना है."&lt;br /&gt;फिर बामनिया भी साथ में चलने से इंकार कर दिया.मैंने कहा कि अच्छा कल मिल लेते हैं तो उसने उससे भी मना कर दिया.&lt;br /&gt;बहुत थोड़े समय के लिए,शायद पूरे साठ सेकेण्ड के लिए ही हमारा यह मिलन था और यह वही अर्चना थी,जिसने मुझे पूर्व में भी कई बार आहत किया था.उन्हीं भाव-भंगिमायों के साथ.पल भर में ही मैं,मैं नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;'घर बनाया था एक,सपनों से लड़-लड़कर,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; पर उन्हीं दीवारों में वही आँसू निकले."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मेरे आँसू,अन्दर ही अन्दर मुझे फिर तप्त करने लगे.मैं और मेरे सपने एक बार फिर चटखने लगे.&lt;br /&gt;मैं क्या करता.....?&lt;br /&gt;मैं कलिंग-विजेता अशोक की तरह सिर झुकाए चुपचाप वहाँ से घर की और चल दिया.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;'जाने क्यों कर बैठे थे हम वादा,उम्र भर साथ निभाने का,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;इस दौर में जबकि हर रिश्ता,दो-चार दिन का बहुत हुआ करता है,'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैं बहुत-बहुत तन्हा घर लौट आया.&lt;br /&gt;इतिहास ने स्वयं को दोहराया था.जब मैं ममता से स्वयं को अलग करने की मनःस्थिति में लगा हुआ था,तब वह भी फागुन माह ही था.आज भी फागुन माह ही है.फ़र्क आज सिर्फ़ इतना है कि आज मैं अर्चना से मानसिक रूप पूरी तरह अलग हो गया हूँ.जबकि ममता से मुझे मानसिक रूप से अलग होने में कई महीने लग गए थें.ममता मेरे जीवन का वह स्पंदन है,जिससे मैं आज भी स्पंदित होता रहता हूँ.ममता से मुझे कोई शिकायत-शिकवा नहीं था,पर उसे था और शायद ता-उम्र रहेगा भी.यह उसका कोई श्राप ही है जो रूप बदलकर ही सही मेरे सामने आज बनकर खड़ा था और इतिहास को दोहरा रहा था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;'अपनी पीड़ाओं से परे, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;और नहीं है कोई इतिहास मेरा...."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्यार आज फिर तुम मुझे छल गए.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"साक्षी गोपाल,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;नाच्यौं मैं भी बहुत....'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मैं दुखी था और यह स्वाभविक भी था,आखिर यह चुनाव तो मेरा ही था तो फिर किसको दोष देने जाता.पर निराश नहीं था क्योंकि इस परिस्थिति के लिए मैं मानसिक रूप से तैयार था.सिर्फ अर्चना ही तो मुझसे अलग हुई है,शेष जीवन तो मेरे पास है ही.अब इसके लिए इस खण्डहर में अरण्य-रोदन कौन करे.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ममता, आज तुम इस रंगमंच पर नहीं हो.अगर होती तो अपने ही किसी श्राप को फलीभूत होते देखतीं.क्या मैं इसी लायक था.तुमने तो मुझे जाना था-समझा था.देखो आज मेरा समूचा अस्तित्व एक प्रश्न-चिह्न अपने पर चस्पा किये खड़ा है.तुम भी मेरे जीवन में ऐसे ही अनाहट आइन थीं और फिर एक दिन ऐसे ही अनाहट चली भी गईं थीं.मैं तुममें और अर्चना में कोई समानता नहीं खोज रहा हूँ.तुममे और अर्चना में कोई साम्य हो भी नहीं सकता है.पर आज तुम बहुत याद आ रही हो.न जाने क्या बात है.तुम्हारे साथ ही तो प्यार से मेरा पहला परिचय हुआ था.तुम्हारे कारण ही तो मैं इस जगत को समझ पाया था.वह तुम ही थी जिसने,जिसने मुझ आवारा को सुधार था,सभ्य बनाया था.तुम्हारे साथ उस युग में सब-कुछ अलग ही था.तुम्हारे जाने के बाद से और अर्चना के आने तक जीवन में वैसे तो कई पढ़ाव आये,पर मैं उन सभी को दरकिनार करता चला गया.वह प्रेम तो था,पर मैं प्रेमी नहीं था.अतः मैं अपना डेरा समेत कर चल देता था.यायावर जो ठहरा.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"प्रेम का प्रतिदान. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;प्रेम ही है, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;जानता है यह अखिल-विश्व, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;फिर भी कह जाता है - &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;क्यों कोई किसी से - &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span class=""&gt;                         -नहीं&lt;/span&gt;."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;और फिर अर्चना,तुम आई मेरे जीवन में.पर शायद तुम मुझे समझ नहीं सकी.यह मेरा भ्रम ही था कि तुमने मुझे समझ लिया है.पर सच तो यह था कि तुम स्वयं को ही कहाँ समझ पाई थीं.तुम भी तो इस अखिल-विश्व की एक इकाई थीं,तुम्हे भी प्रतिदान में प्रेम ही देना था.यह तुम जानती-समझती थीं,फिर भी 'नहीं' ही कह पाई.हालाँकि तुम्हारे साथ मैंने अपने जीवन के बहुत कम पल बीताये.तुम्हारे साथ का युग,समय और मैं,तीनों ही भिन्न थें.उस समय मेरे पास आत्मविश्वास था.संभावनाओं के सूत्र मेरे हाथ में थें.तमाम प्रतिकूलताओं के चलते भी परिस्थिति मेरे अनुकल थीं और जहाँ नहीं थीं,वहां मैं उन्हें अपने अनुकूल बनाने में सक्षम था.जीवन-धारा मस्ती से कलकल कर बही जा रही थी.तात्पर्य यह कि तब मैं ही मैं था और गगन में यहाँ-वहां पंख फैलाये उड़ रहा था.और फिर जब तुम जीवन में आईं तो तुम्हारे आते ही मैं मिटकर फिर प्रेमी होने चला था कि अचानक इतिहास वर्तुल गति से अपनी पंक्तियाँ दोहरा गया.एक अंतहीन नाटक सूत्रपात कर गया.दुःख भरे प्रहसन का सूत्रपात.आज मुझे यह गाथा लिखते हुए पूरे तेरह दिन हो गए हैं.हिन्दू-विधि के अनुसार कहूँ तो आज हमारी संभावनाओं-कल्पनाओं-इच्छाओं--उत्कंठाओं-सपनों और प्रेम आदि की तेहरवीं है.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"बनाते रहे कागज़ों पर इबारतें नित्य नई, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;कभी कविता की-कभी कहानी की, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;अपनी कहानी कोई सुना न सके, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;गीत कोई गुनगुना न सके."&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अंततः अर्चना चली गई.अर्चना-आर्ची मेरे जीवन-प्रांगण से चली गई और मैं फिर,फिर अकेला रह गया.रह गए यह कागज़,यह कलम और यह शब्दों का अंतहीन प्रवाह.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ममता के जिस स्पर्श से मुझे प्रेम की पहली अनुभूति हुई था,मैं कह सकता हूँ कि मेरे लिए प्रेम का जन्म उसी दिन हुआ था और अब प्रेम का मैं कहीं भी अंत नहीं पाता हूँ.ममता के साथ चला यह अंतहीन सिलसिला,जहाँ मैं प्रेमी बनकर इस प्रेम को जीता रहा.कई लोग आये-कई लोग विदा हो गए.कई जगह मैं आया-गया,कहीं-कहीं पढ़ाव भी डाले और यह यायावरी चलती रही.पर अभी-अभी अर्चना के मन-आँगन में आने के बाद मुझे लगता था कि मेरी इस आवारगी को-इस यायावरी को एक ठौर मिल जायेगा.एक स्थिरता आ जायेगी.पर अब पुनः एक नए सफ़र की तैयारी में संलग्न हो गया हूँ.दुखों का अपना महत्त्व है क्योंकि दुःख ही सुख की कामना पैदा करते हैं और सुख की कामना जीवन के प्रति समर्पण का भाव पैदा करती है.हम हारते हैं तो फिर लड़ते हैं,जीतते हैं तो नई लड़ाई के लिए आतुर हो जाते हैं.यही वर्तुल गति सुख-दुःख,आशा-निराशा,हर्ष-विषाद,प्रेम-घृणा के मध्य चलती रही है. अनवरत-अंतहीन,क्योंकि जीवन में कोई भी वर्तुल गतिहीन नहीं होता है और हर गतिशील  वर्तुल अंतहीन होता है.अंतहीन इसलिए कि कोई भी एक सिरा तय कर पाना असंभव होता है.प्रेम भी ऐसा ही होता है,अंतहीन-वर्तुलाकार,बिना किसी कारण के.किसी को किसी से प्यार क्यों हो जाता है,इस प्रश्न का उत्तर तो विधाता के पास भी नहीं होगा.मैं भी कहाँ कुछ जान पाया हूँ जो कुछ भी कह सकूँ.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अतः मैं भी दुःख मनाने बैठ जाऊँ,ऐसा नहीं हो सकता है क्योंकि इस वर्तुल में मैं एक बार फिर कहीं प्रेम का स्पर्श करुगाँ,यह तय है.चाहे उसके लिए मुझे कितना ही समय क्यों लग जाए.इस तरह इस अंतहीन श्रृंखला में न तो दुखों का शौक मनाना चाहिए और न ही सुखों उत्सव,क्योंकि प्रेम से बड़ा न कोई उत्सव है और न ही उस प्रेम से उपजी पीड़ा से बड़ा कोई दुःख है.यह जीवन है या यही जीवन होना चाहिए,ऐसा मैं नहीं कहता हूँ.मैं तो सिर्फ अपनी कहता हूँ.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"लुटा दी हैं चान्दनियाँ सब &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;तुझ पर, तब सूरज से रिश्ता बनाया है."&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;आसमान पर सूरज आज भी उसी जगह पर है जहाँ वह सदियों से है.चाँद भी वहीँ है,जहाँ वह सदियों से हैं और यह आसमान भी.......और सब कुछ तो अपनी जगह पर है.मौसम भी उसी तरह से आ-जा रहें हैं,आते-जाते रहेगें.इस पूरे ब्रहमांड में,जहाँ हर पल कोई न कोई परिवर्तन हो रहा है,तब मैं भी जो इसी ब्रहमांड का एक अणु हूँ तो यदि मैं भी परिवर्तन से गुजरता हूँ तो इसमें आश्चर्य क्या.'शिव-सूत्र' में त्रिपुरारी शिव,माँ पार्वती के इस प्रश्न कि जगत में परिवर्तन क्या है,का उत्तर देते हुए कहते हैं कि -"यह जगत परिवर्तन का है और परिवर्तन को परिवर्तन के द्वारा विसर्जित करो."  &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मुझे भी यही करना होगा.इस परिवर्तन को स्वीकार करना ही होगा.और  जो परिवर्तन हुआ है उसे नए हो रहे परिवर्तन के साथ विसर्जित करना ही होगा.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मैंने सदा इस परिवर्तन को स्वीकार किया भी है.ऐसा भी नहीं है कि मैं कोई संत हूँ जो किसी परवर्तन से पूरी तरह अप्रभावित रहूँ.मैं संत नहीं हूँ, मैं राज हूँ.खुशियों को भी जीया है - आंसूओं को भी जीया है.प्रेम को भी जीया है-घृणा को भी जीया है.दुःख को भी स्वीकार किया है और सुख को भी छुआ है.व्यवहारिक को भी माना है और भावनाओं का मूल्य भी चुकाया है.चुप-गुपचुप भी रहा हूँ.बोल-बोल कर मुँह को भी थकाया है.नाचा-गाया भी हूँ और आँखों को आँसुओं से भर-भरकर धोया भी है.जीवन को जीने के लिए जो भी सर्कस कर सकता था,सब किया है.आगे भी यह सर्कस जारी रहेगा.पर कितना और कहाँ तक यह देखना अभी बाकी है.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"इसी मंच पर, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;इस पार मैं - &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;उस पार तुम सूत्रधार, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;फिर भी हम खेल रहे हैं. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;हमारा नाटक, "जीवन नैया"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बस यह शब्द ही मेरे हर परिवर्तन के साक्षी रहे हैं. मैंने भी हर परिवर्तन को शब्दों में ढालकर अपने ही अक्सों को सम्हाल कर रख लिया है.एक दिन, जब मैं नहीं रहूगाँ, तब यही शब्द-चित्र मेरे बिम्ब बनकर दृष्टिगोचर होते रहेगें.मृत्यु शाश्वत है और अब मुझे उसी शाश्वतता की - उस मृत्यु-उत्सव की प्रतीक्षा है.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगर मेरे पास लेखन की क्षमता नहीं होती तो शायद मैं मैं नहीं रह जाता.क्या होता ठीक-ठीक नहीं कह सकता.पर मैं अपना ही सच स्वीकार करता हूँ कि यदि मैं लिखूं नहीं तो अंतरतम में जो उमड़ता-घुमड़ता रहता है, वह बात बनकर बाहर नहीं आ पाता है. &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"किसी घाट जो ठहर जाता, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;तो बहता कैसे कल-कल कर, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;मुड़ जो जो न जाता कहीं, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;तो गिरता कैसे बन निर्झर,&lt;br /&gt; अपनी अश्रु-अर्चना से परे - &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;और नहीं है कोई इतिहास मेरा."&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बस यही इतिहास रहा है मेरा.हमेशा निर्झर बनकर बहता रहा हूँ.प्यार के इस दरिया में मैंने एक लम्बा रास्ता तय किया है.प्यार के कई घाटों पर ठहरा-थमा भी पर यह सब किनारे ही बनकर रह गये.मैं अपने साथ किसी भी किनारे को निर्झर नहीं बना पाया.अपने साथ चलने को राजी नहीं कर पाया.यह मेरा प्रारब्ध.शायद मेरे नीर में ही वह कल-कल का मधुर नाद नहीं होगा कि कोई मेरे पीछे-मेरी दीवानगी में निर्झर बन मेरे साथ हो लेता.मैं ही अपने में हैमलिन के बांसुरी वादक-सा जादू नहीं जगा पाया.किसको दोष दूँ और क्या दोष देने से मेरे सारे दोष ढँक जायेगें,नहीं,कभी नहीं.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शब्दों से बहुत खेला लिया हूँ,फिर भी शब्दातित ही हूँ.आज कई अनकही बातों को शब्दों में ढालकर सूत्रधार बनना चाहता हूँ.पर यह सूत्रधार भी कितना कमज़ोर है,इस मंच पर रहा तो बहुत देर तक पर फिर भी अभी कुछ छूट गया-सा लगता है.इस पागल सूत्रधार को न जाने किस प्रेम के मृदुल स्पर्श की प्रतीक्षा है.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"कि एक दिन कोई आता,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; पकड़ अंगुली चंचल सुखमय की, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;चल देता यह अवसाद घट - &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;छोड़ कथा इस औघड़ की.&lt;br /&gt; अपनी तथा-कथा से परे -&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; और नहीं है कोई इतिहास मेरा."&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज ग्रीष्म की इस भरी दुपहरी में मैं इस कथा का अंत करने जा रहा हूँ.यह राज अब अपने को समेटने जा रहा है,वही राज,जिसने इस कथा का प्रारम्भ किया था,जब कल सुबह होगी तो वह परिवर्तित होकर दूसरा ही राज हो जायेगा.कल से मैं राज,एक नए राज के साथ शुरुआत करुगाँ,फिर कहीं किन्हीं पन्नों में सिमट जाने के लिए.बहुत वर्षों के बाद लिखा और अपने अवसाद के बाबजुद पूरे आनंद के साथ लिखा.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;होली के रंग भी देखे.उदयपुर - नाथद्वारा के ढंग भी देखे.खूब गुलाल लगाया.श्रीनाथ श्रीकृष्ण के साथ होली की मस्ती भी की और प्रेम के सारे रंग उन पर ही उड़ेलकर स्वयं प्रेम ही हो गया.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"शूल हुए हाथों से - &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;पूजे हमने देवता हमारे, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;एक सूखी नदी में - &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;अर्पण हुए श्राद्ध हमारे,&lt;br /&gt; कोई नहीं नेह-बंधन अब, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;छूटे उम्र के सब मतवारे,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;भटक आये द्वारे-द्वारे,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;मेरे दीप के उजियारे."&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;- शेष फिर.......!                                    &lt;/p&gt;                                           &lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; ====== समाप्त ======= &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;आभार -&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;मैं यह पूरा उपन्यास अपने उस मित्र को समर्पित करता हूँ,विशेषकर यह अंतिम भाग,जिसके एक प्रश्न ने मुझे अपने इस उपन्यास को पुनः लिखने को प्रेरित किया.उसके बिना यह उपन्यास मेरे पास ही कागज़ों में कहीं गुम पड़ा रहता.उस मित्र को साधुवाद.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#666600;"&gt;आप सभी सुधिजनो का जिनकी प्रतिक्रियाओं से मैं उर्जित होता रहा.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वयं का,इसे पुनः लिखते हुए मैं जिन परिस्थिति से गुजरा हूँ,जिस मानसिक यंत्रणा से गुजरा हूँ और जिन दुखो को पुनः जीया है,उसमें भी अपना हौसला बनाये रखने के लिए.                                           ----                                     ------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-2092176816561472294?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/2092176816561472294/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=2092176816561472294' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/2092176816561472294'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/2092176816561472294'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/03/blog-post_22.html' title=''/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-8191211840360101749</id><published>2009-03-15T11:21:00.001+05:30</published><updated>2009-11-15T19:15:45.533+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;पल-प्रतिपल&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;   &lt;span style="color:#ffcc33;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;(भाग-नौ)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह ज़िन्दगी दस्तूर पर चलती है,जज़्बातों पर नहीं.जज़्बात बहकते हैं.अपने उन्मान से ही बहकाते हैं.पूरी नज़्म अगर ज़िंदगी के सफ़े पर शाया हो जाए तो आदमी जो इस कायनात में सबसे दानिशमंद कहलाता है,माना जाता है, बुरी तरह टूट जाता है.ऐसी नज्में जब लफ्ज़ों के दरीचे से ख्वावों की बहारें ला रही होती हैं तो वहीँ उसी दरीचे के पास वाला दरवाज़ा हकीकतों की दस्तकों से भर जाता है.&lt;br /&gt;सवाल यह है कि फिर जीया कैसे जाये और कहाँ तक जीया जाये.मैंने इन्हीं दो ध्रुवों के मध्य सामंजस्य बनाने का दुष्कर कार्य किया है और कब तक करता रहूगाँ,पता नहीं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"जीवन, जो जीया नहीं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;जीया जिसे - &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;उसे जीवन कह न सके....'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस जीवन में लड़ने का हौसला है,हारने का अनुभव है,जीतने के लिए संघर्षों की अंतहीन श्रृंखला है.सुख के लिए आँखों में सलोने स्वप्न हैं.दुखों के निर्बाह के लिए मनःस्थिति है.प्रेम की प्रतीक्षा है.आलोचनाओं का केंद्र बिंदु रहा हूँ.मेरी अपनी क्षमताएं-अक्षमताएं हैं.पर तमाम विडंबनाओं-विविधताओं-विचित्रिताओं-विसंगतियों के चलते इनके बीच मैं निराश नहीं हूँ.हमेशा की तरह आज भी अश्रुदीप जलाकर उसकी ज्योत्स्ना में मुझे इस जीवन में,इसी जीवन में प्रेम की सार्थकता में पूरा-पूरा विश्वास है.आज भले ही मैं दुखी हूँ,पर चूँकि यह दुःख मेरे द्वारा ही चुने गए हैं,अतः मैं ही इनसे बाहर निकलने की युक्ति भी जानता हूँ.इन्हें कहीं भी छोड़ सकता हूँ और इसलिए मुझे अपने दुखों से कोई गिला भी नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"इस परवानों की दीवानगी भी क्या, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मयक़दों को अपनी साकी से होश भी कहाँ, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कि कहनी थी एक दास्ताँ हमे भी, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पर हर महफ़िल में खामोश रह गई ज़िंदगी."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बहुत भटक गया हूँ मैं.पर क्या करूँ,उस पत्र की भाषा थी ही ऐसी कि मैं बहक ही गया.दो दिन के बाद ही मैं राजेश पालीवाल की शादी में सिरोंज चला गया.वह पालीवाल ने मुझसे कहा की डॉ.व्यास की बेटी की शादी में.अभी पिछले ही हफ्ते,अर्चना और नासिर दोनों ही वहाँ मिले थें और दोनों ने वहाँ खूब मस्ती भी की.सुनकर मुझे थोडा अजीब तो लगा पर मैंने ध्यान नहीं दिया और मैं ध्यान देता भी नहीं, क्योंकि मैंने अपने जीवन में कभी संकीर्णता को कोई स्थान नहीं दिया है,पर मेरा ध्यान खींचा स्वयं नासिर ने,उसी ने एक दिन मुझे मेरे आफिस में फोन करके मुझसे मिलने का समय माँगा तो मैंने उससे कह दिया कि वह शाम को आकर मुझसे मिल सकता है,पर उसने कहा कि वह मुझसे अकेले में पेटलाबाद में मिलना चाहता है,तो पहले तो मैंने मना कर दिया पर उसके ज़ोर देने पर कहा कि ठीक है आकर मिलता हूँ,पर फिर गया नहीं.मैं सोच में पड़ गया कि आखिर नासिर को मुझसे क्या काम हो सकता है,मैंने आज तक उसके बारे में सिर्फ़ सुना भर था,उससे कभी मिला नहीं था और न ही वह कभी मुझसे मिलने आया था. उसके बारे मैं सिर्फ इतना ही जानता था कि अर्चना और वो दोनों एक-दुसरे को खूब अच्छी तरह जानते हैं और दोनों में प्यार भी है. इस बारे में मुझे अर्चना ने सिर्फ़ इतना ही कहा था कि वो दोनों अच्छे दोस्त हैं,पर अन्य लोगों ने तो मुझे चटखारे ले-लेकर कई-कई बातें बातें थीं,पर जैसा कि मैंने कहा है कि मैंने कभी इस तरह संकीर्ण होकर नहीं सोचा है और फिर कौन किसके इंतजार में सारी उम्र बैठा रहता है.यहाँ भी यही बात है कि न तो अर्चना मेरे लिए बैठी थी और न ही मैं अर्चना के लिए बैठा था.बस एक दिन हम मिले और हममें प्यार हो गया.मेरे उसके जीवन में आने से पहले और उसके मेरे जीवन में आने से पहले हम दोनों के जीवन में कौन-कौन आया और कौन गया.इसका हिसाब कौन रखता है.मैं तो बिलकुल ही नहीं रखता.अतः जिन-जिनने भी मुझसे अर्चना और नासिर को लेकर रस ले-लेकर बातें करीं थीं उन्हें मुझसे निराशा ही हाथ लगी थी.मैंने भी नासिर से मिलने की या उसके बारे में जानने के बारे कभी भी कोई कोशिश नहीं की थी,यह मेरे स्वभाव में ही नहीं था.यहाँ तक एक-दो बार स्वयं अर्चना ने मुझसे नासिर से मिलने को कहा था, पर मैंने कोई जबाब नहीं दिया.क्यों मिलूं,इसका कभी कोई औचित्य मुझे नज़र नहीं आया.&lt;br /&gt;पर नासिर स्वयं मुझसे मिलना चाहता था.पर क्यों ....यह मेरे लिए एक पहेली से कम न था.उधर मैं मार्च की क्लोजिंग में व्यस्त था.फिर जब महाशिवरात्रि आई तो मैं भोपाल चला आया.यहाँ मैंने पटेल की शादी के उपलक्ष में एक छोटी-सी पार्टी रखी थी.रविवार को सभी मित्र इक्कठे हुए और फिर उन्हीं लोगों के साथ,दिन भर शादी और द्वारका-सोमनाथ के किस्सों में सारा दिन बीत गया.यहाँ मेरे साथ एक अनहोनी हुई,जिसने मुझे अर्चना के साथ मेरे संबंधों के विषय में सोचने पर मजबूर कर दिया.हालाँकि इस अनहोनी का अर्चना से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था.&lt;br /&gt;असद, मेरे बचपन का मित्र,उसने उस रात मुझे अपने विवाह के विषय में जो कथा सुने उसे सुनकर मैं दंग रह गया.जहाँ उसकी शादी तय हुई थी और जिस लड़की से वह प्यार करता था,वहीँ उसके खिलाफ षडयंत्र रचे जा रहे थे और वह वहाँ से भाग रहा था.मुझे दुःख इस बात का था कि असद ने मुझसे पहले से ही यह बात क्यों नहीं बताई.वह बहुत ही उदास और निराश था.आश्चर्य इस बात का था कि उस जैसा जीवट वाला लड़का,प्रेम के मोर्चे से भाग खडा हुआ था.इस पर मेरी प्रतिक्रिया थी कि उसे भागना नहीं चाहिए,बल्कि लड़ना चाहिए.तब मैंने उसे अर्चना और मेरे विषय में बताया और उसमें मैंने अपनी भूमिका के विषय में भी उसे बताया.फिर हम दोनों काफी देर तक इसी विषय पर बातें करते रहे.दुसरे दिन ईद थी और मैं ईद मिलने के जब इरशाद के यहाँ गया तो उसने मुझे असद के बारे में नए तथ्यों से अवगत कराया.रात को जब मैं वापिस बामनिया आ रहा था तो मैं असद के घर गया और फिर उसे लेकर रेल्वे-स्टेशन आ गया.यहाँ आकर हम-दोनों ने प्रेम,विश्वाश,संबंध,छल और इन सबमें अपनी-अपनी भूमिका एवं उसकी सामाजिकता के सन्दर्भों पर करीब दो घंटे तक बातें की.मैंने उसे हर तरह से समझाया कि जीवन में ऐसे दौर तो आते ही रहते हैं.मनुष्य होने की असली परीक्षा तो ऐसे ही मुश्किल दौरों में होती है.उसे लड़ना चाहिए.मुहँ छिपाने से समस्या हल नहीं होती है.समस्या सामना करने से हल होती है.शक और विश्वाश,दो अलग-अलग पहलु हैं.शक की कोई बुनियाद नहीं होती है,शक अनुमानों पर आधारित होता है और विश्वाश की बुनियाद होती है.असद ने भी स्वीकार किया की मैं सही कह रह हूँ.असद ने कहा की वह मेरी बातों से संतुष्ट है और वह इसे गंभीरता से लेगा.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"कह दें तुम्हे अहले बे-वफ़ा, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;हमारी मोहब्बत में वो नफ़ासत कहाँ."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;असद तो चला गया,ट्रेन भी चला दी,पर मैं उस पूरी रात सफ़र में सो नहीं पाया.रात भर मैं इस घटना और उन सारी बातों के सन्दर्भ में ही सोचता रहा.एक तरफ असद था और दूसरी तरफ मैं था.यहीं से मैंने अर्चना के विषय में,उससे अपने संबंधों की नई व्याख्या शुरू कर दी.पर मैं अर्चना को अहले बे-वफ़ा कह दूं,ऐसी तो मेरी मोहब्बत में नफ़ासत कहाँ है.न ममता,न लीना,न अर्चना और न ही अन्य कोई......मैं किसे बे-वफ़ा कह दूं.मोहब्बत में कोई बे-वफ़ा नहीं होता है,सिवाय वक़्त के.रात भर ट्रेन की धड-धड में वो सभी दिन स्मृत हो आये,जब मैं अपनी पूरी दीवानगी-अपने पूरे जूनून के साथ अर्चना तक दौड़ा-दौड़ा जाता था और वह मुझे जानवर तक कह देने में नहीं हिचकती थी.वह कभी मेरे इस जूनून को-मेरी इस दीवानगी को समझ नहीं पाई थी.वह तो मेरे प्यार को ही कहाँ समझ पाई थी.उसके दिए वह सभी दंश यकायक पुनः हरे हो गए.उस दौड़ती-भागती ट्रेन में उन घावों में से मवाद बाहर आने लगा.मैं सोचने लगा कि यह वही लड़की है,जिसने मुझे खिलौना समझा और मैं भी सब-कुछ समझाते हुए-जानते हुए भी,इस लड़की की परिस्थितियां देखकर हमेशा अपने स्वाभिमान को एक तरफ सरकाकर,इसके लिए ढेरों सुखों के अक्स लिए इसी के पास आता था और यह मुझे अपने ज़िद्दी-क्रूर पिता के समकक्ष रखकर ही सोचती थी. काश अर्चना,कभी तुमने अपने इस व्यव्हार के विषय में सोचा होता.मुझे कितना तोड़ा है तुमने,यह तो तुम कभी कल्पना भी नहीं कर सकती हो,क्योंकि तुमने कभी प्यार किया ही कहाँ है?&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;" मैं प्रेम कर, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सब-कुछ पा लेने जैसा- &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पा लेना चाहता था, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;और, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;इस प्रेम-प्रतिदान में - &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;स्वयं को खो बैठा."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कई-कई पीड़ाओं ने मुझे घेर लिया और मुझसे पूछने लगीं कि,"राज,तुम एक बार फिर अर्चना को लेकर घरौंदा बनाने का प्रयास क्यों कर रहे हो,क्यों फिर इस बेकार-सी झंझट में जुट रहे हो.ज़रा सोचो,यह वही लड़की है,जिसके साथ तुम्हे प्यार कम और पीड़ा कहीं अधिक मिली है.तुम इसके साथ क्या कभी खुश रह पाओगे.अगर शादी के बाद भी इसका यही व्यवहार रहा तो फिर उसका परिणाम क्या होगा? कभी सोचा है......?"&lt;br /&gt; मैं अपनी ही पीड़ाओं का अंतर्नाद नहीं सुन पाया.आँसू अन्दर ही अन्दर बह चले.मैं सोचने लगा कि मैंने अर्चना से कहा है कि यदि मुझसे विवाह के प्रति उसकी मनःस्थिति हो तो ही वह मुझसे विवाह करे.वहीँ असद से भी मैंने यही कहा है कि वह भी अपनी मनःस्थिति पर विचार करे.पर क्या कभी मैंने स्वयं अपने प्रेम का,उस प्रेम से उपजी अपनी मानसिकता का कभी आत्मावलोकन किया है? मेरी स्वयं की मानसिकता क्या कहती है?जैसा कि मेरी पीड़ाओं का अंतर्नाद है,उस अंतर्नाद के परिप्रेक्ष्य में मेरी मनःस्थिति कहाँ है?मैं सबसे तो बड़ी-बड़ी बातें कर रहा हूँ,पर क्या यह 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे' वाली स्थिति नहीं है? मैं बस सोचता चला गया-सोचता चला गया.स्टेशन आते रहे-जाते रहे.दिमाग़ की नसें फट जाएँ और मैं मर जाऊँ,इस हद तक मैं सोचता चला गया....!&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;'हुए तुम-प्रेम और मैं मौन, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कितने थें पल पास हमारें, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मिलन को उद्धत थें सभी भाव कि- &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;गीत घुंघरुओं के चुरा ले गया कोई."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैं बामनिया पहुचाँ तो पता चला कि नासिर मुझे कई बार पूछकर जा चुका है.वह मुझसे क्यों मिलना चाहता है,यह तो मैंने अनुमान नहीं लगाया और मैं भाईजान के पास गया और उसे जाकर सारी बातें बताईं कि यह नासिर मुझसे मिलने को बेक़रार है.तो भाईजान ने मुझसे कहा कि मिल क्यों नहीं लेते हो.कल ही चलते हैं और मैं भी तुम्हारे साथ चलूगां. मैं राजी हो गया.दुसरे दिन भाईजान और मैं दोनों ही पेटलाबाद,नासिर से मिलने जा पहुचें.&lt;br /&gt;नासिर भाईजान से इजाज़त लेकर मुझे अलग ले गया और उसने मुझे बताया कि वह डॉ.व्यास कि बेटी की शादी में अर्चना से इंदौर में मिला था.यह तो मुझे पता ही था.मैं तो असल बात जानने में उत्सुक था.उसने कहना शुरू किया कि वहाँ शादी में अर्चना ने उसे मेरे बारे में बताया था और कहा था कि वह एक बार राज से ज़रूर मिल ले और मिलकर प्रेम और विवाह के सन्दर्भ में अर्चना के प्रति मेरा दृष्टिकोण क्या है,यह जान ले.हमने करीब दो घंटे बातें कीं,उन पूरी बातों का सार यह था कि वह मुझसे यह अपेक्षा रखता था कि यदि मैं अर्चना से शादी कर रहा हूँ तो फिर उसे पूरी ज़िंदगी निबाहूँ भी.उसके लिए मुझे अपना परिवार भी छोड़ना पड़ेगा.कहीं इन सबके चलते मैं उसे बीच मझधार में न छोड़ दूँ और फिर किसी अन्य लड़की से कोई संबंध न बना लूँ या उससे शादी न कर लूँ.मुझे पूरी तरह अर्चना के प्रति ही समर्पित रहना होगा.नासिर मुझसे आश्वासन चाहता था या मुझे अर्चना के प्रति ही समर्पित रहने का दबाब डाल रहा था,यह मैं समझ नहीं पा रहा था,क्योंकि उसे भी ठीक-ठीक से नहीं पता था कि आखिर वह अपनी बात कैसे मेरे सामने रखे और किस तरह से वह अपने-आप को अर्चना का प्रतिनिधित्व साबित करे,यह वह भी समझ नहीं पा रहा था.पर वह कहता रहा और मैं जहाँ भी ज़रूरी हुआ उत्तर देता रहा.मुझे आश्चर्य हो रहा था कि आज क्यों कर अर्चना नासिर के माध्यम से यह जानना चाहती है कि मैं कहीं उसे धोखा तो नहीं दें जाउगां.यह तो वह मुझसे सीधे ही पूछ सकती थी,नासिर को बीच में क्यों लाई.पागल लडकी,आज भी मुझे समझ नहीं नहीं पाई है.अर्चना में निश्चित रूप से आत्म-विश्वास की कमी है.अभी वह स्वयं के प्रति ही आश्वस्त नहीं तो वह मेरे पति या किसी और के प्रति क्या आश्वस्त होगी.पर यहाँ एक बात तो स्पष्ट हुई कि वह मेरे बारे में सोच तो रही है,पर मुझे लेकर उसकी मानसिकता अभी भी नहीं बन रही है.&lt;br /&gt;नासिर मुझसे कोई स्पष्ट उत्तर लेकर इंदौर में अर्चना के पास जाना चाहता था तो मैंने उससे कह दिया कि वह अर्चना से न मिले और इस विषय में उसे अकेले ही निर्णय लेने दें.मैं यह पसंद नहीं करूगाँ कि आज वह किसी के कहने से मुझसे शादी कर ले और कल को यदि उसे अपने निर्णय पर पछताना पड़े तो वह यह नहीं कहे कि मैं तो इस शादी के लिए तैयार ही नहीं थी,वो तो मैंने फ़लाने के कहने पर शादी कर ली थी,वर्ना....!और मैं इस बात को कभी सहन नहीं कर पाऊगाँ.नासिर भी इस बात सहमत हो गया,पर वस्तुतः वह करेगा क्या,यह मैं कह नहीं सकता था.वह चला गया.&lt;br /&gt;नासिर कहीं से भी मुझे प्रभावित नहीं कर सका.हालाँकि उसने मुझसे कोई भी बेढब बात नहीं की और बड़े ही अदब से पेश आया,पर फिर भी वह मुझे कहीं से भी प्रभावित नहीं कर पाया.उसने जितनी भी डॉ मुझसे बात करी थी वह अर्चना के प्रतिनिधित्व के रूप में ही बात की थी और उसकी यही शैली मुझे पसंद नहीं आई.&lt;br /&gt;मैं सोचने लगा कि यह अर्चना स्वयं मुझसे इस सभी विषयों पर बात क्यों नहीं करती है.मैं उसके हर सवाल का जबाब दूगाँ और शायद कहीं बेहतर ढंग से जबाब दें पाऊगाँ.मुझे अपनी ही कहानी 'आराधना' की याद आ गई.उसमें मैंने एक जगह लिखा है कि,"ममता,जिस प्यार को मैं सहजता से कह गया,उसी प्यार को तुम कभी भी सहजता से नहीं ले पाईं......!"&lt;br /&gt;आज इतिहास फिर अपने आप को दोहरा रहा था.सहजता और असहजता के बीच जीवन फिर हिचकोले ले रहा था.मेरा अर्चना से मिलना ज़रूरी हो गया था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"हो निस्तब्ध निशा या चांदनी का शोर, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;स्वप्न भर बातें हों या करवट बदलती रातें, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मेरी नींद के यह सब सहारे, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;फिर कौन डाल जाता है सिलवटें मेरे बिस्तर पर, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;दुःख - कौन छोड़ जाता है तुम्हे मेरे द्वार पर."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कितना और कहाँ तक भी चला जाऊं,अंततः वह एक दिन मेरे पास अनाहट आ ही पहुचाँ है.वही 23 मार्च 1994 का दिन,मेरे जीवन का वह पृष्ठ जिसके लिए मैं पिछले कई दिनों से कई-कई पृष्ठ रंग चुका हूँ और स्मृतियों के मेले में यहाँ-वहाँ घूम-भटक भी आया हूँ.इस बहाने स्वयं का काफी मंथन कर लिया है और इस मंथन से जो विष और अमृत निकला है,उसका मैं अकेला ही भागी हूँ.मेरे अन्दर देवासुर संग्राम चल रहा है.पल-प्रतिपल जीत-हार की लहरों पर डूबता-उतराता जा रहा हूँ. इन ढेरों शब्दों के साथ आप सभी को भी बांध लिया है.विषजयी होने अमूर्त कामना के चलते अमृत लुटा रहा हूँ.मैं वही राज हूँ,जिसने अपने जीवन के कई रंग इस फाल्गुन में आपके सामने रख दिए हैं,और पीड़ा का अनुभव तो बाँट दिया है पर उसके एहसास को कभी-भी नहीं बाँट पाऊगाँ.अब इस कथा के सूत्रधार के रूप में बहुत देर से मंच पर हूँ.अब हटता हूँ और प्रस्तुत करता हूँ मेरे जीवन का सर्वथा नया नाटक,"23 मार्च 1994."&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"फागुन, तुम आयें हो / यूँ तो / &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;लेकर हजारों रंग, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;पर कितने फीके-फीके......."&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-8191211840360101749?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/8191211840360101749/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=8191211840360101749' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/8191211840360101749'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/8191211840360101749'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title=''/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-7908236045419775770</id><published>2009-03-01T12:40:00.001+05:30</published><updated>2009-11-15T19:12:05.439+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;पल-प्रतिपल&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;span style="color:#ff6600;"&gt;(भाग-आठ)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी रात मैं अहमदाबाद,पटेल की शादी में शामिल होने के लिए चल दिया.रात्रिकालीन बस आरामदेह मिली अतः दिन भर की थकन के बाद मैं रत भर आराम से सोता हुआ सुबह नडियाद पहुंचा और फिर वहां से बस पकड़कर पेटलाद पटेल के घर पहुंचा और फिर पूरा दिन मित्रों के साथ गहमागहमी में बीता.इन दिनों गुजरात में पानी की बेहद कमी थी, अतः शादियों में मेहमानों की संख्या पर भी प्रतिबन्ध था.शादी भी दिन में ही करने का आग्रह सरकार की तरफ से था और सरकारी आग्रह का मतलब होता है कि उसे मानने में ही भलाई है,अतः यहाँ भी वही सब हो रहा था.मेहमानों के अंतर्गत सिर्फ हम सब बाहर से आये लोगों को गिना गया था,बाकी सब तो स्थानीय ही हो गए थें.इन सभी हलचलों के बीच हम शादी का मज़ा भी लेते रहे और दुसरे दिन हम सभी मित्र बाराती बनकर अहमदबाद आ गए.अहमदाबाद भारत का एक बड़ा औध्योगिक शहर है.इसकी अपनी संस्कृति और अपना ही रंग है.गुजरात का केंद्र बिंदु होने के कारण इसकी गिनती देश के महानगरों की श्रेणी में होती है. यहाँ हम दिन भर शादी में व्यस्त रहे. यहीं हम सभी मित्रों ने द्वारका-सोमनाथ जाने का कार्यकम बना लिया और रात को जब हम सोमनाथ जाने के रवाना हुए तो सोमनाथ जाने का मेरा वर्षों पुराना स्वप्न साकार होने को था.गलत डब्बे में सवार होने के कारण हमें आधी रात तक परेशान होना पड़ा,पर अंततः सब ठीक हो गया और जब सुबह वीरावल से सात किलोमीटर दूर सोमनाथ पहुंचे तो अरब सागर की ठंडी हवाओं ने हमारी सारी थकान और परेशानी छीन हर ली.सुरम्य-सौम्य अरब सागर के किनारे खड़ा सोमनाथ भारतीय इतिहास का वह पन्ना है,जिसके रक्त की स्याही आज भी नहीं सूखी है.इसी मंदिर के विशाल प्रांगण में ग्यारहवी-बारहवी शताब्दी में विश्व-प्रसिद्द युद्ध हुआ था जिसने भारतीय इतिहास की धारा को बदल कर रख दिया था.इतिहास इसे हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए लड़ा गया युद्ध बताता है पर मेरा मानना यही है कि यह भारत की संस्कृति की रक्षा के लिए लड़ा गया वह युद्ध था,जिसके आधार पर कालांतर में इस्लाम के आक्रामक तेंवरों के बाद भी भारतीय संस्कृति जस की तस् बची रह पायी है क्योंकि इस युद्ध ने आगे के ऐसे सभी संघर्षों को अपनी उर्जा दी है.इस महान गाथा पर हमारे साहित्य में दो महत्वपूर्ण उपन्यास हैं, एक आचार्य चतुरसेन द्वारा लिखित,"सोमनाथ" और दूसरा कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी द्वारा लिखित,"जय सोमनाथ" है.हमारा गौरवशाली अतीत के जीवंत दस्तावेज़.सात किलोमीटर लम्बा कब्रिस्तान इसका आज भी साक्षी है.जबसे मैंने यह दोनों उपन्यास पढ़े थे,तब से ही सोमनाथ जाने की इच्छा थी और आज अरब सागर के किनारे खड़ा मैंने प्रकृति की इस अनुपमता और अतीत के रोमांच के बीच खुद को विस्मित-सा पा रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोपहर को हम मंदिर में थें.संगीत की ऐसी भक्तिमय लय पहली बार ही सुनी थी.भक्ति-संगीत का अनूठा आनंद लेकर हम मंत्रमुग्ध से जब मंदिर से बाहर निकले काफी देर तक हम चुप ही रह गए थे.दोपहर के बाद हमने द्वारका की और प्रस्थान किया.यह पूरी यात्रा समुद्र के किनारे-किनारे ही थी.सोमनाथ से द्वारका करीब ढ़ाईसौ किलोमीटर दूर है.रास्ते में हम पोरबंदर भी रुके, महात्मा गाँधी की जन्म-स्थली,अतः विश्व में इसका अपना महत्त्व है.समुंदर के किनारे-किनारे का यह सफ़र बहुत ही सुहावना था.पास में ही हर्षद नामक जगह है,जहाँ हरसिद्धि देवी का प्राचीन मंदिर है.यहाँ भी हम आरती के समय ही पहुँचे और एक बार फिर भक्तिमय संगीत की मधुरता का अमृत छका. रात को हम द्वारका पहुँचे.हिन्दुओं के चार धामों में से पश्चिम दिशा का धाम है द्वारका.श्रीकृष्ण की नगरी - द्वारका.द्वारिका अर्थात् द्वार,द्वार,पावनता का - पुण्य का - धर्मं का - पुरुषार्थ का - प्रेम का - मोक्ष का.रात्रि विश्राम हमनें एक धर्मशाला में किया और अल सुबह आरती में शामिल होने के लिए मंदिर में प्रवेश किया,अर्थात् श्रीकृष्ण की द्वारिकापुरी में प्रवेश किया था.हम सभी बहुत ही आनंदित थें.दिन भर हम द्वारका में घूमते रहे. द्वारका नगर पंचायत द्वारा द्वारका-दर्शन कराया जाता है और यह यात्रा और अधिक आनंदित देने वाली हो जाती है.दोपहर बाद हम सभी सागर किनारे,उसकी लहरों का संगीत और उसकी लहरों से अठखेलियाँ करने पहुँच गए और फिर तीन घंटे तक हम सभी सागर किनारे सन-सेट तक वहीँ मस्ती करते रहे.रात को फिर सफ़र शुरू हुआ अहमदाबाद की और.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह अहमदाबाद पहुंचे तो पता चला कि गुजरात के मुख्यमंत्री का निधन हो गया है.अतः अहमदाबाद सहित पूरा गुजरात बंद था.बंद अहमदाबाद बहुत ही उदास लग रहा था.मित्रों की इच्छा थी कि यहाँ से कुछ खरीददारी की जाए और वह अरमान तो रह ही गया.मेरी यह अहमदाबाद की कोई पहली यात्रा नहीं थी अतः मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था पर बाकी सभी मित्र उदास थें. तब मैंने ही पास में गांधीनगर में अक्षरधाम देखने का कार्यक्रम बना लिया और सब तैयार भी हो गए.दोपहर में हम सभी अक्षरधाम पहुँच गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्षरधाम गुजरात के स्वामीनारायण पंथ का विशाल और भव्य मंदिर है.स्वामीनारायण पंथ गुजरात लोकप्रिय पंथ है,जिसमें स्वामी नारायण के सानिध्य में हरी भक्ति की जाती है.यहाँ विज्ञान और धर्म का ऐसा अद्भुद संगम है कि आप चकित से - मंत्रमुग्ध से रह जाते हैं.महाभारत के मायामहल जैसा यह मंदिर अत्याधिक आकर्षक एवं मोहक है.यहाँ का विशेष आकर्षण है यहाँ का 14 पर्दों वाला थ्री-दी थियेटर.शाम को हम सभी मित्रों ने अहमदाबाद से अपने-अपने धाम की और प्रस्थान किया.सुबह झाबुआ पहुंचकर मैं बामनिया आ गया और फिर थकान उतारने में लग गया..25 फरवरी को मैं इंदौर गया पर अर्चना से मिलने जान-बुझकर नहीं गया.वहीँ से मैं भोपाल चला गया.मैं अपने पिछले प्रवास में ही अर्चना से कह आया था कि मैं अब उससे मिलने नहीं आऊँगा.भोपाल से जब मैं पुनः बामनिया पहुँचा तो अर्चना का पत्र मेरी प्रतीक्षा कर रहा था.इस बीच अर्चना की छोटी बहन का एक्सीडेंट हुआ था और अर्चना उसे देखने बामनिया भी आई थी पर मैं बामनिया था नहीं तो वह नन्द से मेरे बारे में पूछकर चली गई थी.मैंने पत्र खोलकर पढ़ना शुरू किया तो पाया कि पत्र की भाषा काफी बदली-बदली हुई थी.एक रोमांचक भाषा.आज हमारे संबंधों की यात्रा "राज" से "प्रिय राज" के सफ़र से होती हुई,"डियर राज" और "राजजी" के पढ़ाव को पार करती हुई "मेरे राज" के पढ़ाव पर थी.कल संबंधों के यह संबोधन कहाँ पहुचंगे कह नहीं सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"प्यार-वफ़ा-दोस्ती-रिश्ता,सुना तो बहुत है इन लफ्ज़ों को,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कोई तो बताये ऐ "बादल",इनकी पहचान क्या है."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संबंधों की अंतर्यात्रा का अगला पढ़ाव शुरू हुआ.अर्चना तुम शायद ही कभी समझ पाओ कि जीवन में जब प्रेम ही प्रधान हो जाता है और जब जीवन का सारा गणित प्रेम का ही समीकरण बन जाता हो और प्रत्येक स्पंदन की गूँज में जब प्रेम ही राग बनकर संगीत की स्वर-लहरियां छेड़ने लगता है तब जीवन की भावनात्मकता और व्यावहारिकता में और इससे जुड़ी रोज़मर्रा की संगतियों-विसंगतियों में सामंजस्य बैठाना कितना दुष्कर कार्य होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी दुष्करता में मैं सामंजस्य बैठाने में लगा हुआ था.एक तरफ है मेरा परिवार,रिश्तेदार-मित्र आदि,जहाँ इनसे जुड़ी सामजिकता में मेरा अपना एक स्थान है.उस सामाजिकता की उपादेयता मेरे लिए क्या है,यह सोचना निरर्थक है,क्योंकि जीने के प्रति मेरे अपने मापदंड हैं.मेरी अपनी प्रतिबद्धताएं हैं.मेरा अपना तरीका है-क्षमता है अतः उपादेयता के सन्दर्भ मेरे लिए बौने ही हैं.और अर्चना एक दूसरा पहलु है.अपनी सामाजिकता की अनदेखी करना या उसकी उपेक्षा करना कहाँ तक की समझदारी है,यह मैं नहीं जानता क्योंकि हम सभी कहीं न कहीं तो किसी न किसी स्तर पर तो एक-दुसरे से जुड़े हुए ही हैं और फिर जब आप समाज की कतिपय प्रतिबद्धता के स्पष्ट विरोध में अथवा उसके प्रति आक्रामकता का रुख़ रखते हों तो यह और आवश्यक हो जाता है कि इसी समाज में अपनी भूमिका के प्रति गंभीर और स्वयं की प्रतिबद्धताओं-तरीकों-क्षमताओं-उपादेयता के चलते,इसी समाज के एक हाशिये पर समर्पित भी रहें,क्योंकि आखिर में हम सब एक-दुसरे पर निर्भर हैं.आज हमारे समाज में सामाजिकता भी राजनीति की शिकार हुई है और इसी राजनीति की तर्ज़ पर आज समाज अपने हितों की उपेक्षा न तो कर सकता है और न ही उपेक्षा सहन कर सकता है.उसी तरह आपको भी अपने हितों की रक्षा करना अनिवार्य हो जाता है.जिस तरह से हम अपने ढंग से जीने के लिए स्वतंत्र हैं,उसी तरह यह समाज भी हम पर अपने अंकुश थोपने के लिए स्वतंत्र है.अब यह हमारी जीवन-शैली पर निर्भर करता है कि हम sabhi अपनी-अपनी स्वतंत्रता में समाज को कहाँ और कितना स्थान देते हैं.मैं तो अपनी कहता हूँ - मैं तो समाज को हाशिये पर रखकर चलता हूँ.और अर्चना यदि मैं इस समाज पर कुछ भी कहूं तुम तो इन सबसे जुड़ ही जाती हो.मेरा कहना तो सिर्फ इतना है कि मेरा परिवार भी मध्यमवर्गीय है और इसी परिवार में एक लड़की, मेरी बहन भी है और मुझे अपने हितों में एक हित मेरी बहन का विवाह भी नज़र आता है,जिससे मैं न तो आँखें चुरा सकता हूँ और न ही आँखें फोड़ सकता हूँ, न ही आँखों पर पट्टी बांधकर रह सकता हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"उसका घर और मेरा घर, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;घरों के गणित में - आओ चारदीवारी के पीछे प्यार करें,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पर कौन-सी दीवारें.....! &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;किसी ने कहा, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;नहीं कोई घर......."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कविता है और लिखने के लिए शब्दों का अपना संसार होता है.यह संसार एक अलग ही ज़मीं से जुड़ा होता है.इस धरा से थोडा ऊपर और इस आकाश से थोडा नीचे.....यह है लेखन.मैंने इसे जीवन बनाकर भी जीया है और समाज बनकर भी जीया है.मेरा लेखन मेरा प्रतिबिम्ब है,आधी हकीक़त का पूरा फ़साना,पूरे फ़साने की आधी हकीक़त.यहाँ से वहां तक फैला यह शब्दों का जाल जिस पीड़ा की बुनियाद पर बुना गया है,उस पीड़ा में मैं,उस पीड़ा को अपने शैशव की किलकारियों से आज तक जीए एक-एक पल में,जिसमे प्रेम और घ्रृणा,ख़ुशी और उदासी,सुख की चाह और दुखों का चुनाव आदि सभी हैं,से पाया है.यह पीड़ा-यह दुःख मेरी अपनी निजता है.इसमें मेरी माँ के मृदुल स्पर्श से लेकर तुम्हारे प्रेम का स्पंदित स्पर्श तक उपजी पीड़ाओं का जीवंत दस्तावेज़ है.और इसके ठीक विपरीत मेरा वह रूप है,उस राज का,जहाँ वह अपने जीवन के हर आने वाले पल में से उस पल को ढूंढ़ रहा है,जहाँ वह अपने अनावृत जीवन को ढाँक-ढाँप कर थोडा-सा जी सके और इसके लिए यह राज सर्कस के जोकर की तरह,तरह-तरह के यत्न कर रहा है.यही तुम्हारा राज है अर्चना और तुमने तो इस राज के दोनों रूप देखे हैं.उन्हें जाना या नहीं जाना,उन्हें प्यार किया या नहीं किया,यह तुम जानो. मैंने अपने जीवन में बहुत से सपने रचे हैं और जब तुम मेरे जीवन में आईं तो मैंने तुम्हे लेकर भी कई-कई सपनों को जन्म दिया है.हालाँकि जीवन की कटु यथार्थता स्वप्न को नहीं मानती है.वहां तो आपका मूल्यांकन होता है,आपके सपनों का नहीं.वहां तो स्वप्न बेमानी हैं.जीवन की यथार्थता को तो सीधा-सा उत्तर चाहिए कि यह अर्चना तुम्हारे लिए क्या है? उसे प्रेम से क्या लेना-देना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"दस्तूर है यह तो दस्तूर निभायेगें, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;किसी की होगी जफ़ा और बदनाम हम होगें, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;है बहुत खुबसूरत मंजरों की दुनिया,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पर अपने लुटे घर में रहना ज़िंदगी."&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-7908236045419775770?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/7908236045419775770/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=7908236045419775770' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/7908236045419775770'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/7908236045419775770'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title=''/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-5354055933950302174</id><published>2009-01-26T18:05:00.000+05:30</published><updated>2009-01-26T18:29:24.854+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;पल-प्रतिपल&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;span style="color:#ff6600;"&gt;(भाग-सात)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वर्ष 1994 की सुबह.समझ में नहीं आया कि शुभकामनायें लूँ कि दूँ.क्या आज मैं किसी को कुछ दे सकता हूँ.मेरी झोली तो खाली है.मैं अभी हारा नहीं हूँ,पर हारने की पीड़ा है.मैं निराश नहीं हूँ, पर उदास हूँ.मैं टूटा नहीं हूँ,पर दुखी हूँ.अपने जीवन को इस तरह जीने का तो मुझे अधिकार होगा ही और इसीलिए इस रणक्षेत्र में फिर एक नई तैयारी की ओर अग्रसर हूँ.&lt;br /&gt;जनवरी का यह माह कुछ ख़ास गहमा-गहमी का नहीं रहा.कार्यालयीन विवाद तो चलते ही रहते हैं.यह सब मुझे प्रभावित भी नहीं करता है.हाँ, जनवरी में जो सबसे अलग-थलग हुआ,वह था इंदौर से गत पन्द्रह दिनों में अर्चना द्वारा प्रेषित तीन पत्र,जो उसने मुझे लिखे थें.इन पत्रों की भाषा बदली हुई थी.जैसे एक मित्र,दूसरे मित्र के सम्मान में लिखता है,ठीक वैसी ही भाषा.पत्र पाकर मैं आश्चर्यचकित अवश्य हुआ,परन्तु मैंने उन पत्रों का कोई उत्तर नहीं दिया.पर जब मैं इंदौर गया तो मैंने न जाने किस विचार से उससे मिलने की कोशिश की या हो सकता हो कि नियति मुझे छलने के लिए एक ओर चाल के साथ तैयार हो.&lt;br /&gt;वह 28 जनवरी की सुबह थी,जब मैं अर्चना से मिला.एक ओर अदभुद अनुभव.हम कुल दस-पन्द्रह मिनट साथ रहे और उन दस-पन्द्रह मिनटों में अर्चना ही मुझसे बोलती रही.मैं लगभग ख़ामोश ही रहा,वैसे भी मेरे पास एक प्रेमी या एक दोस्त की तरह बोलने को कुछ था भी नहीं और मेरी समझ में भी नहीं आ रहा था कि मैं क्या बोलू. उसका पहला वाक्य था,"अच्छा हमारी याद आ गई."&lt;br /&gt;इस बार मैं उसके साथ उसके महाविद्यालय तक गया.हम दोनों पैदल ही कोठारी मार्केट से रीगल चौराहे से होते हुए एम.वाय.अस्पताल से आगे कृषि महाविद्यालय तक पेड़ों के झुरमुटों से होते हुए उसके महाविद्यालय तक पंहुचे थें.उन पेड़ों के झुरमुटों वाली सड़क पर अर्चना ने मेरे लिए एक निषेधाज्ञा लागू कर रखी थी.पर आज वह सब कुछ नहीं था.मैं अनमना-सा उसके साथ चल रहा था.वह मेरे विषय में पूछती रही,मेरे और अपने घर के बारे में पूछती रही.मैं नपा-तुला उत्तर देता रहा.जब उसका महाविद्यालय आ गया तो उसने मुझसे फिर मिलने को कहा,मैं कोई जबाब देता,उससे पहले ही उसने अगले सोमवार की मुलाक़ात तय कर दी.मैं भी हाँ करके चला आया.&lt;br /&gt;आगामी सोमवार को मैं भोपाल से दोपहर साढ़े बारह बजे इंदौर पँहुचा.एक मित्र के कमरे पर सामान रखकर मैं सीधे अर्चना से मिलने चला गया.दोपहर दो बजे हमारा मिलना तय हुआ था.मैंने ढाई बजे तक उसकी प्रतीक्षा की,फिर महाविद्यालय जाकर पता किया तो पता चला कि आज तो क्लास लगी ही नहीं हैं.मैं खिन्न,पर हर नाराज़गी से दूर वापिस अपने मित्र के कमरे की चल दिया.तब ही चौराहे पर वह मुझे मिल गई और देर से आने के लिए माफ़ी भी मांगी.मैं कुछ नहीं बोला.हालाँकि उसे यह अपेक्षा रही होगी कि मैं उससे हमेशा की तरह शिकायत करूगाँ,जबकि उसके ठीक विपरीत मैंने उससे कहा कि कोई बात नहीं और अगर कोई और काम हो तो वह अभी जा भी सकती है, हम फिर कभी मिल लेंगे,पर वह नहीं गई और हम शाम तक साथ में ही रहे और साथ ही खान भी खाया.राजवाडा,खजुरी बाज़ार,सराफा,क्लाथ-मार्केट में घूमते रहे.उसने कुछ शापिंग की और फिर मैंने उसे उसके होस्टल छोड़ दिया और अगले माह के दूसरे शनिवार को हमारा मिलना तय हुआ.&lt;br /&gt;इस मिलन की मुख्य बातें यह रहीं कि मैंने उससे स्पष्ट कह दिया कि अब तुम पर मेरा कोई अधिकार नहीं है. अब मैं तुम्हे एक मित्र से ज़्यादा नहीं लेता हूँ,हाँ प्यार अब भी करता हूँ क्योंकि उसका कोई अंत नहीं है,पर अब उस प्यार का भी कोई महत्त्व नहीं है और मैं भी अब आगे बढ़ने में उत्सुक नहीं हूँ.&lt;br /&gt;उसके ठीक विपरीत अर्चना ने पूरे समय यही जताने की कोशिश की कि ऐसा सोचना ग़लत है.मुझे इस तरह नहीं सोचना चाहिए,जीवन में यह सब तो होता ही रहता है,हम अब भी अपने संबंधों की एक नई शुरुआत कर सकते हैं.उसने कहा कि चलो मैं मानती हूँ की मेरा ही दिमाग़ ख़राब था और मैंने ही तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया,पर उसके लिए मेरी परिस्थिति कहीं अधिक जिम्मेदार थीं और फिर मैं एक लड़की हूँ,मुझे तो बहुत सोच-समझकर चलना होता है.चलो अब जाने भी दो,हम एक नई शुरुआत करते हैं.पर मैं ऐसा करने को उत्सुक नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"रवायत है कि हँस के है रोना, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;किसी के आसूँ पौछ - अपने आसूओं में डूबना, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बहुत चाहा-बहुत प्यार किया किसी को, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;फिर अपने ही ग़म में जलना ज़िन्दगी...."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैं अब पुनः किसी दुःख पड़ने को उत्सुक नहीं था.&lt;br /&gt;काश ममता, आज तुम होती तो देखती कि तुम्हारा यह राज कैसे-कैसे छलों से होकर गुजरा है.जीवन कहाँ से प्रारम्भ किया था और अब जीवन कहाँ आ पहुँचा है.इन दुखों की-इन पीड़ाओं की गठरी को कहाँ तक और कब तक ढोता रहेगा तुम्हारा यह राज.क्या कहीं कोई सुबह है तुम्हारे इस राज की यह रात ही अपना अँधेरा लिए सुबह के उजाले का रास्ता रोके खड़ी है.उजाले भी असहाय-निर्बल से खडे हैं.तुम्हारा यह राज अब क्या करे.अब मुझे बताओ कि क्या प्रेम अपने साथ सहजता के नाम पर इतनी असहजता को ढोता है?काश ममता, आज तुम होती.....!&lt;br /&gt;अर्चना का पूरा ज़ोर इस बात पर था कि मैं एक बार फिर नए सिरे से प्रारम्भ करुँ.और मैंने अर्चना से कहा कि तुम मुझे छोड़कर किसी और अन्य लड़के को ढूंढ़ लो और उसके साथ शादी कर लो.तुम्हारी शादी की सबसे ज़्यादा खुशी मुझे होगी.फिर मैं भी,तुम्हारी शादी तक तुम्हारी हर मदद करने के लिए तैयार हूँ.तुम चाहो तो अपने खर्च के लिए कोई पार्ट-टाइम जॉब ढूंढ़ लो,इससे तुम्हे अनुभव और पैसा दोनों ही मिलेंगें.मैं यहाँ इंदौर में कुछ लोगों को जानता हूँ,मैं कहूँगा तो वह तुम्हे कोई-न-कोई जॉब तो दे ही देंगे.इसके लिए वह तैयार हो गई,पर इसके लिए उसे अपना होस्टल छोड़ना पर सकता था,तो इस पर मैंने उससे कहा कि मैं तुम्हारे लिए एक कमरे का भी इंतजाम कर दूंगा.मैंने उसके जॉब के लिए अपने एक परिचित से बात करी तो वह अर्चना को काम देने के लिए तैयार हो गए और उन्हीं से मैंने एक कमरा भी ढूंढने के लिए कह दिया.अर्चना ने भी अपनी सहमती दे दी. इस तरह हमारी वह मुलाकात खत्म हो गई और मैं वापिस बामनिया चल दिया.&lt;br /&gt;फरवरी लग चुकी थी,भोपाल में मेरे मित्र राजेंद्र की शादी अहमदाबाद में थी.भोपाल में सभी मित्रों का आग्रह था कि मैं पहले भोपाल आऊं और फिर यहीं से सब साथ-साथ अहमदाबाद चलेंगे,जबकि मेरा मत था कि यहाँ बामनिया से अहमदाबाद पास में है तो मैं यहीं से सीधा अहमदाबाद पहुँच जाउँगा.उसके पहले मैं इंदौर आफिस के काम से गया और वहीँ मेरी अर्चना से भी भेंट हुई.हम दोनों साथ-साथ खजराना के गणेश मन्दिर भी गए.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"अभिव्यक्ति प्रेम की सिमट गई तुम स्वयं में,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;फिर शरमाई-इठलाई या रूठी पता नहीं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;और विमूढ़-हतप्रभ-अवाक्-सा मैं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;क्या जानू कि भला रहा या बुरा रहा,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;इस तरह, एक अर्चना में खो जाना मेरा, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;पाप था क्या मेरे लिए, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;प्यार करना-तुमसे मेरा."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इंदौर में खजराना में गणेशजी का प्रसिद्द मन्दिर है.इस मन्दिर की काफी मान्यता है.हर मंगलवार-बुधवार और हर चतुर्थी को यहाँ दर्शनार्थियों का मेला-सा लगता है.उस दिन भी हम-दोनों ने वहां दर्शन किए और पूरे दिन साथ-साथ ही रहे.&lt;br /&gt;यहाँ से हमारे संबंधों का एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ,शायद नियति ने ही यह अध्याय प्रारम्भ किया था और मुझे इसके अंत को लेकर भय-संशय आदि भी था.यहाँ से हमारे संबंधों के समीकरण बदल गए.शायद पहली बार हम-दोनों इतने क़रीब-क़रीब थें कि सारे फ़ासले,फ़ासलों पर छूट गए थें.निश्चित रूप से वह मुझे खोना नहीं चाहती थी,नहीं तो उसने कभी भी मुझे अपने इतने क़रीब नहीं आने दिया था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"छुईमुई तुझे तो - &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;छूना भी पाप है......"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वह भावनाओं और उत्तेजना के नाजुक क्षण थें,जब मैंने उससे पूछ लिया,"अच्छा बताओ,अब मुझसे शादी कब कर रही हो?"&lt;br /&gt;उसने कहा, "परीक्षा के बाद."&lt;br /&gt;पर अगले ही क्षण मुझे लगा कि मैंने फिर एक नए स्वप्न को जन्म दे दिया है.पीड़ाओं के नए द्वार तो नहीं खोल दिए हैं.यह मैं क्या कर रहा हूँ. मैंने एक गहरी साँस ली.मुझे लगा कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था.पर अब क्या, अब एक स्वप्न जन्म तो ले चुका था.अर्चना ने मुझे अनमना देख पूछा,"क्या हुआ?"&lt;br /&gt;मैंने सिर झटककर कहा,"कुछ नहीं."&lt;br /&gt;वह बहुत देर तक अपने अस्त-व्यस्त बालों-कपड़ों को सम्हालती-सवांरती,मेरे अनमनेपन को समझने की कोशिश करती रही या वह मेरे अनमनेपन को भाप चुकी थी.मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकता.पर मुझे अन्दर से लग रहा था कि मुझे यह बहकना कहीं गहरे दुखों में न धकेल दे.&lt;br /&gt;हाँ, यह सत्य है कि यदि अर्चना यहाँ इंदौर आने से पूर्व मुझसे सलाह लेती तो मैं उसे यहाँ आने ही नहीं देता.पर अब तो बात ही अलग हो चुकी थी. शाम को मैं उसे मेरे एक परिचित ज्योतिषी तारे के पास ले गया.इस बार मैंने अर्चना की पत्रिका उसे दिखाई तो उसने अर्चना को कई बातें बताई और साथ ही उसे उसके परिवार के विषय में भी बताया.अर्चना अवाक् उसे सुनती रही.मैंने अंत में तारेजी से कहा कि मैं इस लड़की से शादी करना चाहता हूँ,तो वह मुझे यह बतायें कि हमारी शादी के क्या योग हैं और हमारा जीवन कैसा व्यतीत होगा तो उन्होंने अर्चना की पत्रिका देखते हुए एक अनूठी ही बात कह दी.उन्होंने अर्चना से कहा कि तुम जिस लड़के से विवाह के बारे में सोच रही हो,उस लड़के से विवाह की तुम्हारी मानसिकता नहीं बन पा रही है,बस परिस्थितिवश तुम उससे विवाह करना चाहती हो.अर्चना चुप ही रही और मैं.........मेरे पास तो कुछ बोलने को बचा ही नही.&lt;br /&gt;इस एक वाक्य ने मुझे अंतरात्मा तक छू लिया.काफी गहरे जाकर लगी मुझे यह बात.मुझे स्वयं पर बड़ा आश्चर्य हुआ कि जब मैं अर्चना को लेकर हर पहलु पर इतना सोचता था कि कई बार मुझे लगता था कि जैसे मेरे दिमाग़ की नसें ही फट जायेगीं,तब मेरे दिमाग़ में यह बात क्योंकर नहीं आई की जो लड़की गाहे-बगाहे मुझसे यह कहती रहती है कि मैं तुमसे प्यार नहीं करती हूँ और जिस तरह का व्यवहार वह मुझसे करती आई है,फिर उसका यह पल-पल रंग बदलना.....कहीं वह यह सब अपनी मनःस्थिति से तो नहीं बोलती है? और कहीं कोई मज़बूरी तो उसे मेरे क़रीब नहीं ला रही है?मेरे अंतरतम ऐसे कई प्रश्न मुझे मथने लगे.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"होगें तेरे सबसे क़रीब हम,यह ख्या़ल था हमें, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;लमे हाथ जाते न जाते, सब ख़्वाब टूट चले.'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;तारेजी के इस एक वाक्य ने सारे समीकरण ही बदलकर रख दिए. मैं अचानक गुरु-गंभीर हो गया.एक भारी चुप्पी लिए हम-दोनों वहाँ से बाहर निकल आए.अर्चना चुपचाप मेरे साथ चलती रही.उसके अन्दर क्या चल रहा था,मेरे पास इस सबका आंकलन करने का समय नहीं था.मैं स्वयं कि मनःस्थिति के आंकलन में लगा हुआ था और वह इसे अच्छी तरह समझ रही थी.हम दोनों इस समय महारानी रोड से निकलकर सब्जी-मंडी होते हुए कृष्णपुरा की छतरी तक चुपचाप ही चलते हुए आ गए थें और जब हमारे रास्ते अलग होने का समय आया तो चूँकि उसे कोठारी मार्केट अपने होस्टल तक जाना था और मुझे किशनपुरा से परदेशीपुरा के टेंपो पकड़ना था.छतरी एक कोने पर हम आकर रुके,सड़क के उस पार टेंपो-स्टैंड था और यह सीधी राह कोठारी मार्केट की और जा रही थी.कुछ देर की चुप्पी के बाद मैंने अर्चना से कहा,"अर्चना, दोपहर में मैंने जो कहा था,मैं उन सभी शब्दों को वापिस लेता हूँ और अब यदि तुम मुझसे शादी करना चाहती हो तो किसी मज़बूरी से नहीं,किसी भावनात्मक रूप से नहीं, वरन अपनी मनःस्थिति को ध्यान में रखकर ही कोई निर्णय लेना.मुझे तुमसे किसी मज़बूरी के कारण शादी नहीं करनी है."&lt;br /&gt;उसके पास मानो कुछ भी कहने को नहीं बचा हो.उसके लिए शब्द गुम हो चुके थें,ज़ुबान पर तालें पड़ चुके थें या पता नहीं उसके मन में क्या चल रहा था,यह तो वही बेहतर जानती होगी.बहरहाल,उसने कुछ भी नहीं कहा और ख़मोशी से मुझे सुनती रही.मैंने आगे कहा,"देखो अर्चना, यहाँ से दो रास्ते हैं,एक सामने वाला रास्ता है जो मुझे मेरे घर तक ले जाएगा और एक यह रास्ता है जो तुम्हे तुम्हारी मंज़िल तक ले जाएगा और हम दोनों आज ही यह रास्ते अलग-अलग कर लें तो.......?"&lt;br /&gt;वह चुप रही.....और फिर हम कुछ देर तक बिना बोले ही वहाँ खड़े रहे.अंत में मैंने ही कहा,"चलें."&lt;br /&gt;उसने पहली बार कहा,"हाँ,कल मिलते हैं."&lt;br /&gt;और फिर वह बड़ी ख़मोशी से कोठारी मार्केट की और चल दी और मैं उसे वहीँ खड़ा हुआ जाता देखता रहा और फिर मैं भी परदेशीपुरा की और चल दिया.&lt;br /&gt;उस पूरी रात मैं सो नहीं पाया.ढेरों विचार मुझे मथते रहें. हर बार यही लगा कि प्रेम के लिए भावनाओं का मूल्य चाहे जो भी रहा हो, मनःस्थिति भी उतनी ही आवश्यक है.मैंने पहले इस पहलु पर ध्यान क्यों नहीं दिया.अब तो यह बहुत ही आवश्यक हो गया है.वैसे भी मैं मनःस्थिति का पक्षधर रहा हूँ,यह मनःस्थिति ही है जो जीवन में आमूलचूल परिवर्तन लाती है और जीवन के कई निर्णयों में यही मनःस्थिति सार्थक सिद्ध होती है.इस तरह कई-कई विचारों के साथ मैंने वह रात गुजार दी.दूसरे दिन सुबह मैं अर्चना के पास गया और हम उसके लिए एक आशियाना ढूंढने लगे.उस लेकर मैं अपने एक मित्र के घर गया और उससे भी मैंने एक कमरा किराये पर लेने बाबत कहा तो वह बोला कि एक कमरा मेरी नज़र में है,यदि मकान-मालिक मिलता है तो मैं तुम दोनों को वहाँ ले चलता हूँ और फिर वह मकान-मालिक को देखने चला गया.तब मैंने अर्चना को अपने पास बैठकर बड़ी संजीदगी से कहा कि अब यदि तुम्हे मुझे अपने पति के रूप में चुनना हो तो तुम्हे पहले अपनी मानसिकता उस अनुसार बनानी होगी.तुम्हारे जीवन में चाहे लाख कुछ घट रहा हो और तुम किसी दबाब में आकर मुझसे शादी करना चाहती हो और तुम्हे मुझसे प्रेम ही नहीं हो तो ऐसे विवाह का क्या फायदा?हम क्यों जीवन भर का दुःख मोल ले लें? फिर मैंने उसके सामने पहली बार अपने सारे आर्थिक-सामाजिक पहलू रख दिए और उससे यह भी कहा कि माना मैं शब्दों या वाकचातुर्य में निपुण हूँ,पर तुम मेरी किसी भी बात में मत आना.अपना निर्णय स्वयं के विवेक के आधार पर ही लेना.अब तुम्हे अपने भविष्य के विषय में स्वयं ही सोचना है.मुझे मत सोचना-मेरे बारे में मत सोचना.कहीं ऐसा न हो कि तुम्हे बाद में पछताना पड़े और घर कलह का मैदान बन जाए.मेरे जीवन में प्रेम का महत्त्व है,यदि आपस में प्रेम है तो हम-दोनों हर परिस्थिति में भी सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर लेंगे,पर यदि प्यार ही नहीं है तो रिश्ते निभाने से ज़्यादा ढोने पड़ जाते हैं. मैं यह सब पसंद नहीं करूगाँ.अंतहीन दुखों का जो सिलसिला प्रारम्भ होगा,उसे मैं सहन नहीं कर सकता. मैं ऐसी किसी भी स्थिति के लिए तैयार नहीं हूँ.मैं बहुत अधिक सुख कि चाह में नहीं हूँ,पर जीवन में-घर में शान्ति अवश्य चाहता हूँ.जीवन में शान्ति है तो सारे सुख हैं.&lt;br /&gt;वह भी मेरी बातों से सहमत हुई और तय हुआ कि वह इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार करेगी और अपने निर्णय से मुझे अवगत करा देगी.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"प्यार कीजिये फूलों से कुछ इस तरह, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कि हँसते हुए कांटें भी साथ में कम लगें."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह हमारे संबंधों का - प्रेम का एक नया आयाम था.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-5354055933950302174?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/5354055933950302174/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=5354055933950302174' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/5354055933950302174'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/5354055933950302174'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/01/1994.html' title=''/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-8913462964097576164</id><published>2009-01-23T12:01:00.001+05:30</published><updated>2009-11-15T19:09:03.327+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;पल- प्रतिपल&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;    &lt;span style="color:#ff6600;"&gt;( भाग-छः&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैं वापिस बामनिया लौट आया और फिर जब सुबह सोकर उठा तो मैं बिल्कुल ही दूसरा था.&lt;br /&gt;इस घटना को कोई डेढ़ माह से ऊपर हो गया.इस बीच मैं अर्चना से नहीं मिला और न ही मिलने की कोई कोशिश की, जबकि इस बीच मैं तीन बार इंदौर होकर आ गया था,पर उससे मिलने की कोई इच्छा भी मुझे नहीं हुई और इस तरह मैं उसे धीरे-धीरे अपने ख्यालों से भी जुदा करता चला गया.इधर दीवाली पास आ रही थी.दीवाली की छुट्टियाँ लगीं तो अर्चना बामनिया आई.महाराज, जिनके घर में मैं अपने शुरूआती दिनों में खाना खाने जाया करता था और इस परिवार का मुझ पर विशेष प्यार था.उस दिन हमारी मुलाकात महाराज के घर पर हुई थी.मैं महाराज के घर गया हुआ था और वहीँ पर अर्चना किसी काम से आ पहुँची थी.मैंने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया,वरन उसने ही मुझसे बात प्रारम्भ की.मैंने भी उससे एक दोस्त की तरह ही हालचाल पूछे.इससे ज़्यादा मैं हमारे बीच के संबंधों को कोई महत्त्व नहीं देना चाहता था.मैं वहां से चला आया.उसने मुझे वहां रोकने की कोशिश की,पर मैं उसे अनसुना करके चल दिया. दीवाली के दो दिन पहले मैं भोपाल चला आया.&lt;br /&gt;यहाँ भोपाल में मेरे लिए वही काली दीवाली थी.मेरे जीवन की कई दीवालियाँ काली ही बीती थीं.हर दीवाली एक त्रासदी की तरह मनाता आ रहा हूँ.मेरे बचपन की एक दीवाली वह भी थी,जब मुझे चोर ठहरा दिया गया था और मुझे मेरे ही पिता ने घर से बाहर निकल दिया था.मैं छोटा-सा मासूम,लाख आंसुओं के साथ भी अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर पाया था और मुझे चोर ठहराने वाले मुझ पर हँसते हुए दीवाली मनाते रहे और मैं कई दिन तक फुटपाथों पर यहाँ से वहाँ भटकता रहा और मानवीय संबंधों पर से मेरा सदैव के लिए विश्वास उठ गया.मुझे किसी के घर तो क्या,अपने ही घर में प्रवेश करते हुए भी डर लगने लगा. फिर कुछ साल बाद एक दीवाली वह भी आई,जिस रात मैं ममता को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह आया था.उस रात हम-दोनों आखिरी बार मिले थें और एक-दूसरे से अपने-अपने दर्द भी बाँटना चाहते थें.पर बिना कुछ बोले,सिर्फ़ आंखों से बिदाई का भाव लिए हम-दोनों अलग-अलग चल दिए........फिर कभी न मिलने के लिए.आज जब मैं सोचता हूँ कि यदि हमनें उस रात अपने-अपने दर्द बाँटे होते तो क्या बाँटते........ममता 'दस्तक' से उपजी अपनी पीड़ा-अपने क्रोध को बाँटती और मैं उस प्यार में मिली कई कही-अनकही पीड़ा को बाँटता........शायद ऐसा ही होता.......शायद.......! आज इस शायद के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं.मेरे लिए यह अमावस्या की रात कभी उजाला लेकर नहीं आई. मैंने दीवाली मानना बंद कर दी.और आज यह दीवाली भी.........यहाँ में था और थी मेरी तन्हाईयाँ.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"अंधेरे में न  डुबोइए   ख़ुद को इतना, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कि रोशन होने के लिए सूरज कम लगे"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जब मैं बामनिया वापिस लौटा तो मुझे आफिस के काम से इंदौर जाना पड़ा.जब मैं सुबह की बस पकड़कर इंदौर जाने के लिए निकला तो उसी बस में अर्चना भी सवार हुई और पूरी बस खाली होने के बाद भी वह मेरे पास आकर बैठ गई.मुझसे हेलो कहा और उसने बातों की शुरुआत कर दी.बातों ही बातों में उससे कहा कि तुमने मुझे कहा था कि तुम किसी लड़के से प्यार करती हो, तो तुम एक काम करो कि तुम उस लड़के से ही शादी कर लो और यदि तुम्हे इस काम में मेरी मदद चाहिए तो मैं तुम्हारी मदद करने के लिए तैयार हूँ.मैंने उससे यह भी कहा कि मैंने तुमसे प्यार किया है और मैं जब तुम्हे इस तरह भटकते हुए देखता हूँ तो अच्छा नहीं लगता है.तुम घर में सबसे बड़ी हो और तुम्हे अपनी छोटी बहनों के बारे में भी सोचना चाहिए.इस तरह इंदौर तक हमारी इस विषय पर कई तरह से बातें हुईं.अंत मैंने उससे कहा कि यह मेरा सुझाव भर है और तुम इसे मानो ही यह भी ज़रूरी नहीं है.तुम्हारी ज़िन्दगी तुम्हारी अपनी है और उस पर निर्णय लेने का तुम्हे ही अधिकार है.हाँ, अब मैं तुम्हारी ज़िन्दगी में नहीं हूँ.अतः यह मत समझाना कि इन सब बातों में या इन सब बातों के पीछे मेरा कोई स्वार्थ है.मैं तो सिर्फ़ इतना चाहता हूँ कि तुम खुश रहो.उसने मुझसे कहा कि वह इन बातों पर विचार करेगी और मुझे बाद में अवगत करा देगी.मैंने इंदौर में अपना काम करके पुनः बामनिया लौट आया.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"हमसे ही पूछते हैं,ख़ुद हम ही, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;बता ऐ गा़फिल,तेरा नाम क्या है."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;शीत की सिरहन शुरू हो चुकी थी.यहाँ बामनिया में ज़्यादा वृक्ष नहीं हैं,अतः यहाँ न तो ज़्यादा गर्मी पड़ती है और न ही उतनी बरसात होती है और न ही तेज़ ठंड पड़ती है.हर ठंड में मेरा एक शौक रहा है कि मैं हर ठंड में एक-दो स्वेटर खरीद लेता हूँ,पर यहाँ ठंड ही नहीं पड़ती तो इस बार मैंने असद से कहा कि मैं जब भोपाल आँउगां तो हम एक जैकेट खरीदेगें.पर ऐसा हो नहीं पाया.इस बीह अर्चना का जन्मदिन पड़ा तो मैंने औपचारिक रूप से उसे एक शुभकामना-पत्र प्रेषित कर दिया.इस दौरान मैं एक सप्ताह तक इंदौर में रहा और वहाँ पर मेरी और मेरी बहन की शादी की चर्चा चलती रही.  यह सच है कि मैं अपनी बहन की शादी को लेकर काफी चिंतित रहा हूँ.उसकी उम्र भी दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और लड़के हैं कि पता नहीं कहाँ जाकर गुम हो गए हैं.उसका विवाह मेरी प्राथमिकता में है और लगता है कि हर ब्राह्मण घर में मानो लड़कियाँ ही लड़कियाँ हों.जिसे देखो वह मेरे लिए अपनी लड़की का रिश्ता लेकर चला आता है.पर मैं किस-किससे क्या कहूं.मेरी मनःस्थिति अभी शादी की नहीं है.मेरा जीवन क्या सिर्फ़ दुखों की बलिबेदी पर चढ़ने के लिए तो नहीं है.मैं तो एक लड़का ढूंढ रहा हूँ जिसके साथ अपनी बहन की शादी कर सकूं.पर यहाँ तो सब अपनी ही कहने में व्यस्त हैं,मुझे कोई नहीं सुनना-समझना नहीं चाहता है.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"आते रहे लोग मयकदे में और पीते रहे सुबह तक,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; पर किसी ने न पूछा,ऐ  'बादल'    तेरा जाम कहाँ."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अजीब फितरत है इस जहाँ की .यहाँ रोना चाहो तो हँसना पड़ता है.यहाँ हँसों तो लोग रुला देते हैं.यहाँ प्रेम पर लंबे-लंबे भाषण हैं-ग्रन्थ हैं-गीत हैं-प्रार्थनाएं हैं-विचार हैं-दर्शन है-व्याख्याएं हैं,पर इसके ठीक विपरीत इन्हीं लोगों को,प्रेम-प्रेमी-प्रेमिका,कोई भी स्वीकार नहीं है.इश्क-हकीकी की बातें हैं.इश्क से इस्म-ए-शरीफ़ (परिचय) भी नहीं है.यहाँ इश्क के लिए बेताबियाँ हैं.यहाँ हर हयात,इश्क-ए-हयात के मनगढ़ंत किस्से लिए घूम रही है और दूसरी तरफ़ आशिकों को काफ़िर करार दे उन्हें संगमार की सज़ा दी जा रही है.तब इश्क-ए-खुदा,खुदा-ए-इश्क के आलम में इश्क को लेकर जो बदगुमानियाँ हैं,उसमें तो यह नज़्म है......,&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;".......खुदा-खुदा में यह अन्तर, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;इस खुदा-ए-आलम में, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;तो क्यों कहें - &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;इश्क को खुदा हम......"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैं वापिस बामनिया लौट आया.यहाँ शीत की सिरहन ज़्यादा नहीं थी और मैं शीत का आनंद लेने भोपाल चल आया.यहीं मेरा जन्मदिन भी पड़ा.पर मेरे लिए उसका कोई महत्त्व नहीं था सिवाय एक और आँकड़े के कि मैं और थोड़ा बड़ा होकर और थोड़ा कम हो गया हूँ.जीवन न तो राजनीति है और न ही आर्थिक बाज़ार,न क्रीडांगन,जहाँ मैं हर-वर्ष अपने गुण-दोषों की विवेचना करता फिरूँ.मैंने प्रारम्भ से जीवन को उसकी सहजता में जीने का प्रयास किया है,पर उसे कितनी सहजता से जी पाया हूँ,यह विश्लेषण या निष्कर्ष दूँ तो वह यह है कि मैं जीवन को कई बार उसकी असहजता में ही जी पाया हूँ.उपलब्धियाँ रहीं,पर उसके नक्श-ए-क़दम पर अनुपलब्धियाँ भी चलती रहीं और मैंने अपनी हर अनुपलब्धि को अपने ही गुण-दोषों की विवेचना पर स्वीकार्य किया है. कभी किसी अन्य को दोषी नहीं ठहराया है.मुझे याद है कि एक दिन मैंने यहीं इंदौर में अर्चना से यही कहा था,"अर्चना, तुम मुझे बताओ कि यकायक तुमने मुझे नापसंद क्यों कर दिया.मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम दोषी हो,दोषी मैं ही हूँ,पर तुम मुझे बताओ मुझसे कहाँ पर क्या और कैसी गलती हुई है.मैं अपनी हर भूल स्वीकार कर उसे सुधारने के लिए कटिबद्ध हूँ और सुए दुबारा न करने के लिए प्रतिबद्ध भी हूँ.क्योंकि मेरे अपने विचार से इस धरा पर,विशेषकर अपने भारत में तो कोई लड़की इतनी बेबकूफ़ नहीं होगी जो अपने प्रेमी को,जिसके पास शिद्दत-जूनून सब-खुछ हो,जो हर तरह से सक्षम हो और जिसे इस तरह से ठुकरा दिया जाए,यह मेरी समझ से बाहर है."&lt;br /&gt;पर अर्चना ने कोई उत्तर नहीं दिया.&lt;br /&gt;मैंने भी अर्चना के उत्तर की प्रतीक्षा भी नहीं की.पता नहीं मैं निर्दोष हूँ. मेरे सामने कभी भी जीवन न्यायपालिका बनकर नहीं आया.मैं जानता हूँ और आज उम्र के इस दौर में तो मैं अपने अनुभव से यह भी कह सकता हूँ कि जीवन परिस्थितियों पर ज़्यादा निर्भर करता है.परिस्थितियां आपके नियंत्रण में भी हो सकती हैं और अनियंत्रित भी हो सकती हैं.कारण- आपका जीवन दुसरे के जीवन से जुड़ा हुआ है,चाहे किसी भी रिश्ते से क्यों न हो,कोई न कोई तो आपसे जुड़ा ही रहता है.वहीँ आपके अन्दर का जीवन एकाकी भी हो सकता है,आपकी अपनी वैचारिकता-व्यैक्तिकता हो सकती है,पर जहाँ से दूसरा जीवन प्रारम्भ होता है,वहाँ से आपके स्पंदन को दूसरे स्पंदन के साथ ताल-मेल बैठाना ही पड़ता है.आप वस्तुतः अकेले नहीं हो सकते हैं.आपकी आन्तरिकता नितांत एकाकीपन का अनुभव कर सकती है,परन्तु वस्तुतः आप एकाकी कभी होते नहीं हैं.यह मेरा अनुभव रहा है.मेरे जीवन के इस एकाकीपन में भी बचपन से आज-तक कई लोग आए और गए.कई लोगों से मैं जुड़ा और कई लोग मुझसे जुड़ गए.समय की धारा में मिलना-बिछुड़ना लगा रहा.इन लोगों से मिझे सुख और दुःख दोनों मिले और अगर इन लोगों से पूछा जाए तो यह लोग मेरे से भी ऐसी ही प्राप्तियां निकलेगें. अगर बचपन से शुरू करुँ to मेरी पूरी कथा अपने ऐयारियों-तिलिस्मों के साथ एक और "भूतनाथ" बन सकती है.यही मेरा जीवन है.वैसे हम सभी जीवन को किसी-न-किसी स्तर पर तिलिस्म में ही जीते हैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"भटक आए द्वारे-द्वारे, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;मेरे दीप के उजियारे,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; स्वप्न गीत रह गए- &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;नींद भरे नयनों में, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;चाँद कितना प्यासा रहा, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;प्रेम की अंजुरी में,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;रूठी चाँदनी को मना लाये,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;अरे ऐसे कहाँ भाग्य हमारे."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आज अपने ही जन्म-दिन पर मुझे यह सब कितना याद आ रहा था.आज मेरे जीवन की यायावरी द्वार-द्वार उजियारे की तलाश में भटकते हुए उन्तीस वर्ष पूर्ण कर रही थी और मैं इस पढाव के अगले पढाव की तैयारी में था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"जीवन की सुध किसे - &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;अरे यायावर हम,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; कितने अनजाने पथों की धूल छानी, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;कितने तारें गिन डाले, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;चूर नहीं हुए थककर हम,     &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span class=""&gt;              अरे&lt;/span&gt; यायावर हम......"&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-8913462964097576164?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/8913462964097576164/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=8913462964097576164' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/8913462964097576164'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/8913462964097576164'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/01/blog-post_22.html' title=''/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-6840617782345480719</id><published>2009-01-19T21:43:00.001+05:30</published><updated>2009-11-15T19:11:33.503+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'>पल-प्रतिपल      (भाग - पाँच)</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;पल-प्रतिपल&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;    &lt;span style="color:#ff6600;"&gt;(भाग - पाँच)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"राह-ए-मोहब्बत में हम-तुम चले भी तो क्या चले, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt; थोड़े फ़ासले से तुम चले,थोड़े फ़ासले से हम चले"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; इंदौर मेरी जन्म-भूमि, मेरे बचपन का शहर,मेरी शरारतों का शहर,मेरी मस्ती का शहर,मेरी किशोरवय अठखेलियों का शहर,मेरे यौवन की उनींदी सुबह का शहर, मेरा जीया शहर.....मेरा इंदौर.वह इंदौर,जिसके कई हिस्सों में आज भी मेरी कई स्मृतियाँ मचल रहीं हैं,इठला रही हैं,इतरा रही हैं,उमड़-घुमड़ रही हैं.आज उसी शहर में मेरा यह सर्वथा अनूठे ढंग से - एक अलग ही नयेपन के साथ आगमन था.आज यह शहर मुझे अजनबी-सा लगा या हो सकता है कि मैंने ही यहाँ अजनबी की तरह प्रवेश किया हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्ची अब तुम ही बताओ कि किस तरह से  मैं यह व्यक्त करुँ कि जिस शहर में मैं बहुत ही अपनेपन के साथ दौड़ा-दौड़ा चला आता था,आज तुम्हारे लिए यह राज कितने चुपके से यहाँ आया है,कितने परायेपन के साथ तुम्हारा पता पूछ रहा है,तुम्हे ढूंढ रहा है.क्या कोई अपने ही शहर में ऐसा करता है ? क्या कोई इस तरह से अपने ही शहर में पराया भी हो सकता है ? पर आर्ची को इससे क्या लेना-देना,प्रश्न तो मेरे अपने थें और इन सबके उत्तर भी मुझे ही ज्ञात करने थें.उसकी तो अब दुनिया ही अलग थी.अपनी ढेरों धड़कनों के साथ मैं आर्ची से मिला.जीवन की इस शतरंज की इस सर्वथा नई बिसात पर कुछ सर्वथा नई चालें....,"तुम यहाँ क्यों आए...?"&lt;br /&gt; यह उसका पहला वाक्य था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"प्रेम से आगे कुछ भी नहीं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;प्रेम में ही सब-कुछ समाया है, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;कहा-सुना-लिखा यह बहुतों ने, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;पर मुझ-सा हतभागी कोई हुआ नहीं है."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उस पहले वाक्य से हमारे संबंधों की जड़ों पर निर्मम प्रहार प्रारम्भ हुए.जब मैंने उसके सामने पुनः विवाह का प्रस्ताव रखा तो उसने मुझसे कहा,"न मुझे तुमसे कोई संबंध रखने हैं और न ही मुझे तुमसे विवाह करना है."मैं बहुत-बहुत आहत हो गया.काश किसी भी भाषा में मुझे अपनी इस पीड़ा को लिखने के लिए शब्द मिल पाते.उन दिनों के वह सब पल मुझे शब्दशः स्मृत हैं.मैंने उसे समझाने की हर संभव कोशिश की, पर वह एक ही राग छेड़े रही," मैं तुमसे प्यार नहीं करती."&lt;br /&gt;"क्यों मेरे पीछे पड़े हो ?"&lt;br /&gt;"मेरे कालेज तक मत आया करो.नहीं तो अपने कालेज के लड़कों से पिटवाऊंगी."&lt;br /&gt;"मैं किसी और से प्यार करती हूँ."&lt;br /&gt;" मैं तुम्हारी रखैल नहीं हूँ."&lt;br /&gt;"तुम तो जानवर हो."&lt;br /&gt;"तुम तो जानवर से भी गए बीते हो. जानवर को दुत्कार दो तो वह फिर नहीं आता है.यह बात तुम्हे समझ में नहीं आती है."&lt;br /&gt;"तुम्हारे जैसा बेशर्म मैंने आज तक नहीं देखा है.रोज़-रोज़ यहाँ आ जाते हो."&lt;br /&gt;"तुम कौन, मैं तो तुम्हे जानती तक नहीं."&lt;br /&gt;ऐसी ढेरों कड़वी बातें हैं,जो मुझे अपने इंदौर के चार-पाँच बार के प्रवास में गत एक माह में सुनने को मिली.यह सावन-भादों मुझे कितना रुला रहे थें-कितना तड़पा रहे थें.इस बार की बरसात ने मुझे कितना भीगोया-कितना मैं अपने ही आंसुओं से भीगा,यह हिसाब मेरे पास नहीं था और न ही यह हिसाब बरसात के पास था और आर्ची,उसे यह हिसाब रखना आता ही कहाँ था.पता नहीं वह किस मिट्टी की बनी हुई थी,मुझे समझ ही नहीं पा रही थी - न जाने मैं किस मिट्टी का बना हुआ था,स्वयं को ही नहीं समझ पा रहा था.मैं आर्ची के पास जाता रहा.उसकी कड़वी बातें सुनता रहा.रोता रहा-हँसता रहा.वाह रे सावन-भादो....!&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"लोग क्यों रोकते थे हमें आँधियों का मुंतज़िर होने से, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;आज तिनके-तिनके होकर यह बात समझ में आई है."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह शब्द थें मेरी पीड़ा का गान और क्या लिखूं इससे ज़्यादा.बचपन से जीने के प्रति जिस प्रतिबद्धता को मैं समर्पित रहा,इतने दिनों में मैं अपनी इसी प्रतिबद्धता के चटखने की आवाज़ भी न सुन पाया.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"एक प्रेम बंधन में बंध - &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;आना बारम्बार सपनों का, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;जीवन के नितांत उपास्य क्षणों में - &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;छलकर जाना सपनों का,                  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;अपने सपनों के छल से परे,                  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;और कोई नहीं है इतिहास मेरा."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इन छले हुए सपनों में से कई चेहरे - कई पल अनायास ही स्मृत हो आए.ममता,तुम्हे कितना छला था मैंने.तुम्हारे मन के हर द्वार पर मैंने बिना तुम्हारी सहमती-अनुमति के कई-कई बार दस्तक दी थी.तुम्हारे साथ मैंने एक ही सपना देखा था कि बस तुम होगी मैं हूगाँ,और फिर हमारे मिलन का साक्षी यह ब्रह्माण्ड हम में ही विलिन हो जाएगा......यह एक झूठा सपना था,क्योंकि तुम्हे तो ख़बर ही कहाँ थी कि तुम्हारा एक दीवाना ऐसा कोई सपना भी देख रहा है और मैंने तुम्हे इस सपने को बताने के लिए कई बार तुम्हारे द्वार पर दस्तक भी दी.जिस "दस्तक" की गूँज तुम्हारे जीवन में गूँजी थी और तुम तब कितनी-कितनी आहत हो गई होगी,यह मैं आज समझ पा रहा हूँ,जब तुम्हारे श्राप से आज मैं अपने ही द्वार के टूटने अनुगूंज सुन पा रहा हूँ.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"मैं चाँद और सूरज की - &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;काँवर लिए, तारों की पगडंडियों पर जाना चाहता था,  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;इस यायावरी ने, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;मेरे लिए घर एक सपना बना दिया."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आज मैं अपनी ही पीड़ा का विषपान कर, विषजयी हो रहा था.चाँद था,चांदनियां थीं,सूरज था,किरणें थीं,तारें थें........पर अब इस यायावर के पास न काँवर थें और पगडंडियाँ न जाने कहाँ गुम होकर रह गई थीं.मैं जान नहीं पा रहा था और यह पल मैंने किसी से कह भी नहीं पा रहा था.&lt;br /&gt;ममता, उस समय तुम मुझे बहुत याद आईं और मैंने तुम्हे ही केंद्रित करके एक लंबा पत्र आर्ची को लिखा कि वह एक बार तो मेरे बारे में ठंडे दिमाग़ से सोचे और अपने जीवन के विषय में कुछ सार्थक निर्णय ले.&lt;br /&gt;ममता मेरे जीवन-आकाश पर पन्द्रह वर्ष तक देदीप्यमान रही थी.प्रेम वह भी था-प्रेम यह भी था.आरधना वह भी था-आराधना यह भी थी. अधूरा मैं वहां भी रह गया था - अधूरा मैं .......? &lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इन सब घटनाक्रमों के चलते मैं एक बार फिर बीमार पड़ गया और नन्द मुझे छोड़ने भोपाल तक आया.मैं किंकर्त्यव्यविमूढ़  था. कुछ समझ नहीं पा रहा था.जीवन का यह अनूठा ही दौर था.मैं जीवन में जब-जब भी परेशानियों में घिरा,तब-तब भोपाल के बड़े तालाब के किनारे जा पहुँचता था और उसकी लहरों के साथ अपने सुख-दुःख,जब-तब बाँट लिया करता था.बड़े तालाब में अजीब-सा आकर्षण मैंने अपने प्रति हमेशा से पाया था.इसके किनारों ने-इसकी लहरों ने मुझे कई बार बहुत ही आत्मिक शान्ति पहुंचाई है.आज जीवन ने मुझे फिर बड़े तालाब के उसी किनारे पर लाकर खड़ा कर दिया था,जहाँ से मैंने अपने जीवन के लिए कई निर्णय लिए थें.आज फिर एक अन्य निर्णय के लिए मैं वह था.मैंने लहरों के साथ स्वयं को बाँटना शुरू किया......,&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"कितना प्यार करुँ मैं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;रहा बैठा ताल किनारे - &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;गुपचुप,गुमसुम-गुमसुम, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;लहरों को कितना देखा करुँ मैं,              कितना प्यार करुँ मैं...."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लहरों में मेरा अक्स था और फिर जैसे ही हम-दोनों ने एक-दूसरे को पहचाना,बातें शुरू कर दीं.लहरों ने मुझसे कहा," राज, और कितना भटकोगे.कैक्टसों के जंगल में प्यार नहीं किया जा सकता है.वहाँ प्यार करने के लिए हथेलियाँ नहीं बिछाई जाती हैं.प्रेम के लिए तो फूलों की घाटी में जन्म लेना पड़ता है.मुझे तुमसे हमेशा यही शिकायत रही है कि तुम प्यार करते ही क्यों हो ?"&lt;br /&gt;मैं चुप था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"भागता है मन बहुत, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पर मैं ठहरा रहता, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;गुम अपनी ही धुन में, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;और कितना तड़पा करुँ मैं,             कितना प्यार करुँ मैं......"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लहरें फिर कह उठीं," राज,चुप न रहो.कुछ तो कहो कि आख़िर क्यों करते हो इतना प्यार ? क्या शब्दों को सान पर चढाने के लिए ? क्या प्यार में तड़पना तुम्हारा शगल है ? छोडो भी अब यह बेकार की बातें.तुम हमेशा गहराई से और गहरी बातें करते हो, जबकि लोग आज यहाँ कानों से सुनने के आदी हैं,यह ह्रदय से सुनते ही कहाँ हैं."&lt;br /&gt;मैं क्या कहता.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"पहाडों को छू लिया, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;नदियों में भीग लिया,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt; नाचा भी हरी दूब पर, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;और कितना अभिव्यक्त करुँ मैं,                कितना प्यार करुँ मैं......"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लहरें भला कहाँ चुप थीं," राज, आज का युग प्रेम में जीने का नहीं है,जब तुमने ममता को अपने अस्तित्व से अलग किया था,तब तुम दूसरे थें,किशोरवय के भीगे स्वप्न तुमने युवावस्था की देहरी पर तोड़े थें.तुम और ममता किसी प्रेमिल आकाशगंगा से आए थें और यहाँ इस धरा पर आज जबकि युग पल-पल बदल रहा है,तुम रहे वही आकाशगंगा वाले प्रेमी ही.इस धरा की गंगा में अब तक बहुत पानी बह चुका है.यह अर्चना है."&lt;br /&gt;क्या कहूं मैं.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"देखता हूँ बहुत पास, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;और छू लेना भी चाहता हूँ, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;पर स्पर्श है स्वप्निल-सा, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कहो कितने स्वप्न देखा करुँ मैं,                  कितना प्यार करुँ मैं....."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लहरें मेरी एक-एक भाव-भंगिमा पढ़ रही थीं और कह रह थीं,"राज, स्वप्न सिर्फ़ स्वप्न ही होते हैं.तुम संवेदनशील हो.प्रेम कर सकते हो.पर यह अर्चना है.अगर यह अपना जीवन अपने ढंग से बीतना चाहती है तो तुम क्यों अपने प्रेम का अड़ंगा लगते हो.क्या यह आवश्यक है कि हर व्यक्ति प्यार के साये में ही जीवन व्यतीत करे ?"&lt;br /&gt;मैं फिर भी नहीं बोला.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"तेरी-मेरी बात नहीं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;बने यह कथा जग की, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;पर मिलन की बात नहीं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;कहो कितना इंतजार करुँ मैं,                   कितना प्यार करुँ मैं......"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लहरें बे-परवाह बोलती रहीं," राज, अर्चना को उसके हाल पर छोड़ दो.प्रेम में अधिकार सहज प्राप्य हो तो ठीक,पर अधिकार को अधिकार की तरह मत मांगो.किसी इंतजार की आवश्यकता नहीं है.लोगों ने तो तुमसे बहुत-कुछ कहा है,पर मेरी एक बात यह भी सुनो कि तुम्हारा भी अस्तित्व है,तुम्हारा भी स्वाभिमान है,तुम जानवर नहीं हो.तुम प्रेमी हो और यदि कोई तुम्हे समझ नहीं पा रहा है तो परेशां क्यों होते हो ?"&lt;br /&gt;मैं सिर झुकाए चुपचाप सुनता रहा.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"तुम रहो एहसास में मेरे,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; अँगुलियों का स्पर्श न सही, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;ह्रदय की तस्वीर ही सही, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;कितना स्पंदित रहूँ मैं,               कितना प्यार करुँ मैं....."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;लहरें मुझे समझती रहीं," राज, अब छोडो भी यह किस्सा.तुममे जीवन को नए सिरे से शुरू करने का माद्दा है.अभी कई सूरज तुम्हारा इंतजार कर रहें हैं.कई चांदनियां भी तुमसे मिलने को बे-ताब हैं.कई तारें तुम्हारे जीवन में चमकने को तैयार हैं.कई फूल खिलने को तैयार हैं.अर्चना का अध्याय बंद करो.उसे प्यार करो.उसे प्यार करो जैसे कि प्यार किया जाता है,पर अपने जिस्म की हर ज़ुबां को बंद कर लो.मेरी लहर-लहर तुम्हारी है.&lt;br /&gt;आख़िर हुआ भी वही.1 अक्टूबर 93 की सुबह,जब मैं कुछ क्षणों के लिए आर्ची से मिला तो मैं उसकी हाँ या न के लिए मानसिक रूप से पूर्णतः तैयार था.मैंने उससे पूछा," तुम्हे मेरा पत्र मिला ?"&lt;br /&gt;"हाँ"&lt;br /&gt;"तुम्हारा क्या निर्णय है ?""&lt;br /&gt;वही पुराना निर्णय."&lt;br /&gt;और मैं वहाँ से चल दिया,बिना एक भी शब्द और कहे.वह भी चल दी थी,मेरे पास से ही नहीं वरन मेरे जीवन से भी दूर जाने के लिए चल दी थी.मैं दुखी था,पर उसके तल्ख़ एहसास से बहुत दूर था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"फासले इतने न कीजिये कि दुनिया कम लगे, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt; ज़िद इतनी न कीजिये  कि  उम्र कम  लगे."&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-6840617782345480719?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/6840617782345480719/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=6840617782345480719' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/6840617782345480719'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/6840617782345480719'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/01/blog-post_19.html' title='पल-प्रतिपल      (भाग - पाँच)'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-405089620168364684</id><published>2009-01-15T23:54:00.001+05:30</published><updated>2009-11-15T19:04:41.404+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'>पल-प्रतिपल     (भाग-चार)</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;पल-प्रतिपल&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;        &lt;span style="color:#ff6600;"&gt;(भाग-चार)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"सूत्रधार सुनो, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;खेलना है अभी हमें, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;इस जीवन के अनगिनत नाटक, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;न जाने कितनी यवनिकाएं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;न जाने कितने पटाक्षेप&lt;/span&gt;."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैं भोपाल से वापिस आया तो अर्चना को  मैंने एक पत्र लिखा,जिसमें मैंने उसे साफ़ लिखा कि मैं कोई खिलौना नहीं हूँ,जिससे तुम जब-तब चाहो खेलती रहो.मैं भी इन्सान हूँ.प्यार की तरह प्यार कर सकती हो तो प्यार करो अन्यथा हमारें संबंधों को यहीं विराम दे दो.  &lt;br /&gt;इस तरह मैंने हमारे संबंधों का भविष्य तय करने का अधिकार उसे दे दिया.उसका जबाब सकारात्मक रहा.जब उसका दूसरा पेपर था तब उसी ने तय किया था कि हम रतलाम में पुनः मिलेगें.बाद में हम-दोनों यहाँ बामनिया से ही साथ-साथ रतलाम गए और उस दिन-उस शाम कई माह बाद, या शायद पहली बार हमनें कई विषयों पर खुलकर बात की.शायद पहली बार हम दोनों दो प्रेमियों की तरह साथ थें.वहीँ हमने हमारे जीवन-हमारे भविष्य को लेकर कई सार्थक बातें की और यह तय किया कि हम दोनों दीवाली के बाद शादी कर लेगें.शादी की पूरी व्यवस्था मैं ही करूगाँ.उस दिन हमने कई योजनायें बनाई.वह सचमुच एक नई शुरुआत थी और हम दोनों उस दिन खुशी-खुशी घर लौट आए. &lt;br /&gt;यह जगह बामनिया मुझे शुरू से ही पसंद नहीं थी.मैं अपने आपको बहुत अकेला पता था.कोई नहीं था जिससे मैं अपने दिल की बात कह सकूँ और मैं मौन ही रह जाता था.ख़ुद से ही अनकहा-सा.अब आर्ची से मेरी शादी होने वाली थी और जो जगह मुझे पसंद नहीं वहाँ मैं अपनी पत्नी को कैसे रख सकता था, अतः मैंने यहाँ से निकलने के लिए ज़ोर लगना शुरू कर दिया.यहाँ से  मेरा जाना ज़रूरी हो चला था और इसी तारतम्य में भोपाल आ गया.अपने स्थानांतरण में लग गया.मई की झुलसती गर्मी में मैं यहाँ से वहाँ भटकता रहा और कोई भी नतीजा हाथ नहीं आया.जहाँ भी गया सिर्फ़ आश्वासन के सिवाय कुछ भी नहीं मिला.मैं थक-हारकर वापिस बामनिया लौट आया.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"पत्थर हैं सरे-राह,ऊँची दीवारों की तरह, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कहाँ से रास्ता ढूंढें,सारे रस्ते बंद मिलते हैं."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मैं निराश ज़रूर था, पर एक आशा  यह भी थी कि दीवाली तक कुछ न कुछ ज़रूर हो जाएगा और मैं दीवाली का इंतजार करने लगा.बामनिया पहुँचते ही दो हादसों का सामना करना पड़ा.एक- आर्ची के घर में उसके पिता ने किसी बात पर महाभारत मचा रखी थी.उसी रात को उस यमराज ने तीनो बहनों को धक्के मारकर घर से निकल दिया.रात को तीनों बहनें मेरे पास आईं. मैंने उन्हें घर वापिस लौट जाने की सलाह दी,जिस पर तीनों ही तैयार नहीं हुईं.वह रात तो हमने जैसे-तैसे काट ली.सुबह दो बहने अपनी मौसी के पास जवारा चली गईं और आर्ची पेटलावद में अपनी सहेली के यहाँ चली गई.दुसरे मुझे अपने कार्यालय से एक शो-काज नोटिस मिला हुआ था जिसका मुझे तीन दिन में उत्तर देना था.अब प्रेम और कार्य के मध्य मैं था.एक दिन तो मुझे यह सोचने में ही लग गया कि मुझे करना क्या है?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मैं आर्ची की इस नई स्थिति से खुश नहीं था. मैं उसके लिए कुछ करना चाहता था. तब मैंने सोचा की क्यों न मुझे उससे अभी ही शादी कर लेनी चाहिए.हालाँकि उस समय मेरे पास विवाह के लिए,खासकर इस तरह के विवाह के लिए तो कोई तैयारी ही नहीं थी,परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में मेरा प्रेम,प्रेम के प्रति मेरी प्रतिबद्धता,मेरी नैतिकता,मेरी वैचारिकता आदि सभी इस विवाह के पक्ष में थें.अतः मैं खूब सोच-विचारकर आर्ची से मिलने पेटलावद जा पहुँचा.पहले तो वह मुझसे मिलने को ही तैयार नहीं हुई और फिर जब वह मुझसे मिली तो उसने जिस तरह का व्यवहार मेरे साथ किया,उसे तो मैं दुर्व्यवहार भी नहीं कह सकता.उसने मुझसे कहा कि मैं ही उसके इस आज के लिए जिम्मेदार हूँ और उसके बाप और मेरे में कोई अन्तर नहीं है.हूँ दोनों एक जैसे ही हैं और शादी के बाद मेरा व्यवहार भी उसके बाप जैसा ही रहने वाला है और वह ऐसे शख्स से शादी नहीं कर सकती है,जिस पर उसके बाप की छाया हो.मैं फिर छलनी-छलनी हो गया.दूसरी बार मैंने उसकी सहेली को समझाने की कोशिश की और हमारी दूसरी मुलाकात उसकी सहेली के साथ ही हुई.उसने भी उसे समझाया पर वह अपनी ही बात पर अडी़ रही.मैंने उससे कहा कि वह मुझे अपने बाप से अलग करके देखे.मैं तुम्हारे पिता का अक्स नहीं हूँ. मैं राज हूँ और मैं तुम्हे प्यार करता हूँ.हमारा जीवन प्यार की नींव पर व्यतीत होगा और मैं तुम्हे जीवन की हर खुशी देने की कोशिश करूगाँ......पर मेरी सारी बातें व्यर्थ ही चली गईं.उस पर कोई असर नहीं हुआ. मैं बिल्कुल ही असहाय होकर रह गया.मैं उसके लिए बहुत-कुछ करना चाहता था,पर बहुत....बहुत ही असहाय था. ओशो ने लिखा है,"घ्रृणा के बनिस्वत मनुष्य प्रेम में ज़्यादा असहाय होता है, क्योंकि वह अपने प्रेम के लिए सब कुछ कर लेना चाहता है और सब कुछ करके भी उसे लगता है कि अभी उसने कुछ भी किया ही कहाँ है.' मेरी भी स्थिति ऐसी ही थी.मैं भी सचमुच इतना ही असहाय हो चला था.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"खाई हैं     जिन्होंने     दर-दर   की ठोकरें, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;घर छोड़ा था उन्होंने,दुनिया को अपना समझकर."&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;यह शे'र जब मैंने आर्ची को सुनाया तो उसने मुझसे कहा कि अब वह नर्स बनने का सोच रही है और ट्रेनिग के लिए इंदौर जाना चाहती है.मैंने उसे फिर समझाया कि नर्स कि ज़िन्दगी कितनी कठिन है और वह इस लायक नहीं है.उसे कोई दूसरा काम कर लेना चाहिए.वो यह काम नहीं करे.पर वह अपनी ही ज़िद पर अडी़ रही.मैं फिर चुप हो गया.मुझे लगा कि हमारे संबंधों के अंत का समय आ गया है और मैंने उसे खो दिया है.एक दर्द-सा सीने में उठा और मैं बैचेनी महसूस करने लगा.क्या प्यार का हर अंत ऐसा ही होता है. क्या प्यार ऐसे ही छीन लिया जाता है.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"एक टुकडा धूप का,एक हिस्सा चाँद का.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt; मुझसे न छीनो,यह सब मेरे नसीब का."&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर यह सब मुझसे छीना जा रहा था.मेरे हिस्से के चाँद-सूरज,मेरे हिस्से की धूप,मेरे हिस्से की चांदनी,मेरे हिस्से की रोशनी,मेरे सपनें,मेरी कल्पनाएँ,मेरी आकांक्षाएं,मेरा प्रेम,मेरी तन्हाईयाँ, मेरा सब-कुछ......और छीनने वाला और कोई नहीं,वह थी स्वयं आर्ची.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जैसे-तैसे मैंने स्थितियां सम्हाली.घर की भी और प्रेम की और कार्यालय की भी.अर्चना को मैंने वहीँ पेटलावद में एक प्रायवेट स्कूल में नौकरी पर लगवा दिया.उसका संचालक मेरा मित्र था अता काम आसान रहा. और मुझे लगा कि अब स्थिति फिर मेरे नियंत्रण में है.मुझे आश्चर्य सिर्फ़ इस बात का था कि ठीक पन्द्रह दिन पहले हमनें अपने भविष्य के लिए कई सपने बुने थें. एक नई शुरुआत के लिए हम प्रतिबद्ध भी थें कि आज अचानक इतना बड़ा परिवर्तन? पठान ने मुझसे कहा कि राज यह तुझे बेबकूफ बन रही है.तुझसे प्यार नहीं करती है और तू भी यह मान ले,हमें तो यह खुली आंखों से दिखाई दे रहा है.मुझे पठान की बातों पर सोचने को मजबूर होना पड़ा क्योंकि हालात ही कुछ ऐसे बन गए थें.मुझे भी लगा कि आर्ची वास्तव में मुझसे खेल ही रही है और प्यार तो उसे मुझसे है ही नहीं और मैं उसके  लिए कुछ भी नहीं हूँ, वह तो बस जब चाहती है मुझे इस्तेमाल कर लेती है.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक बार फिर आज ममता की याद आ गई.ममता के सपने देखते-देखता मैंने उस पर अपने प्यार को व्यक्त कर ही दिया था और वह इसे अच्छी तरह से समझती भी थी,पर मेरे प्रति उसका व्यवहार बिल्कुल ही अलग था.हम हर विषय पर बात कर लेने को तो तैयार रहते थें पर प्यार की किसी भी बात पर वह बात करने के लिए तैयार नहीं रहती थी.उसने कभी भी मेरी किसी भी प्रेम अभिव्यक्ति का कोई भी प्रतुत्तर नहीं दिया था. "दस्तक' में मैंने उसे लिखा था,'प्रियश्रुति सुनो, मैं बादल, विस्तृत नभ छोटा-सा त्रिशंकु और तुम ममता, इस विश्व में कहाँ हो, इसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं की है." ममता मुझे अनसुना कर गई,उसे मुझे अनसुना करना ही था.मुझे उसके द्वारा अनसुना ही रह जाना था.हम-दोनों एक-दूसरे से बिना कुछ कहे-सुने ही रह गए.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन इस आर्ची को मैं कैसे समझाऊं? आर्ची और ममता में अन्तर है. ममता के साथ मेरे संबंध प्लेटोनिक थें, मैं उसके बहुत करीब था,पर कोसो दूर था.यह दूरियां मैं कभी भी नहीं पाट पाया था.उसके सामने मेरा मौन उससे बातें करता था और भावप्रवण आँखें मेरे उस मौन का प्रत्युत्तर हुआ करती थीं.  हम दोनों कभी भी सहज नहीं हो पाये थें.इसके ठीक विपरीत आर्ची थी,जहाँ प्यार को हमने उसकी सहजता में स्वीकार किया था.हम मुखाग्र थें और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि हमारे संबंध प्लेटोनिक नहीं थे,यह बात अलग थी कि आर्ची मुझे समझ नहीं पाई थी या हो सकता है कि किसी कारणवश वह मुझे अनदेखा करती हो.मैं यह स्वीकार करने को तैयार था अब हम बिछुड़ चले थें.मैंने भी अपने आप को नई परिस्थिति के अनुरूप ढाल लिया था और उसकी तरफ़ ध्यान देना बिल्कुल ही बंद कर दिया था और स्वयं को समझा लिया था कि यदि वह ऐसे ही खुश रह सकती है तो ऐसा ही सही.प्रेम तो सहजता में ही होता है,मैं उसे अधिकार के नाम पर असहज क्यों बनाऊ.पर सपनें.....उनका क्या करुँ...?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"माना बिछुड़ गए हैं हम-तुम, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;पर यह / जीवन से लेकर जीवन की बात थी, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;सपनों को लेकर, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;ऐसा सौदा कब हुआ था."&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;धीरे-धीरे मैं पठान और राजेश के साथ स्वयं को शतरंज की बाज़ियों में उलझता चला गया और यह भूल ही गया कि जीवन की बिसात पर नियति ने एक और चाल चल दी है. वह अगस्त 93 का माह था.सावन अपने पूरे शबाब पर था.बारिश ने तन-मन दोनों ही भीगो रखे थे.उन्हीं दिनों सावन की रिमझिम फुहारों के बीच आर्ची से मेरी मुलाकात हो गई और मैंने उससे उसके परीक्षा-परिणाम के विषय में पूछ लिया.उसने बड़े ही चहकते हुए मुझे उत्त्तर दिया और फिर हम कुछ देर तक बड़े ही अच्छे ढंग से बात करती रहे.इस दौरान मैंने नोटिस किया कि वह मुझसे बात करने के लिए ही बात कर रही है और मुझे फिर से आकर्षित करने की कोशिश कर रही है.मुझे लगा कि संबंधों की राख में एक नई आग लगा देने के लिए कहीं कोई चिंगारी अभी बाकी है.पर मैंने स्वयं कोई उतावलापन नहीं दिखाया.मैंने स्वयं के ऊपर बहुत ही नियंत्रण रखा.मेरे इस व्यवहार पर उसने भी ध्यान दिया और उसने मेरे साथ कुछ स्वतंत्रता लेने की भी कोशिश की.मैंने ख़ुद को अपनी ही खाल में बनाये रखा.यह सब क्यों हो रहा था मैं समझ नहीं पा रहा था.जीवन की शतरंज पर नियति अपनी ढाई घर की चाल चलने को तैयार थी.मैं इस चाल से पूरी तरह अनभिज्ञ था.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;"दुःख, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;कौन छोड़ जाता है तुम्हे मेरे द्वार पर,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; उठता हूँ प्रातः तो पाता हूँ तुम्हे,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt; नित - नव रूप में अपने द्वार पर......"&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसी सावन की एक सुबह मुझे आर्ची की छोटी बहन से पाता चला कि आर्ची तो इंदौर किसी ट्रेनिग के लिए चली गई है और अब पूरे दो साल बाद लौटेगी.पल भर के लिए मैं स्तब्ध रह गया.नियति की ढाई घर की चाल.क्या वह नर्स की ट्रेनिंग के लिए.......सेवा के नाम पर नर्क.इस घटना ने मुझे विचलित कर दिया.अब वह वापिस नहीं लौटेगी.एक छोटे से कस्बे की रहने वाली लड़की इतने बड़े शहर में कैसे रह पायेगी...क्या करेगी.शहरों की ज़िन्दगी बहुत की कठीन होती है.वहां हर सुख-सुविधा होती है,पर ख़तरे भी उतने ही हुआ करते हैं.वहां छल मुस्कुराता हुआ ही आता है.दुर्घटना की शक्ल नामालूम हुआ करती है.वहां पर यह लड़की क्या करेगी? क्या एक नर्क से दूसरे नर्क में जाया जा सकता है?ओशो का एक कथन स्मृत हो आया कि मनुष्य असमंजस की स्थिति में सदैव एक अति से दूसरी अति पर चला जाता है.आर्ची भी यही कर रही थी.घर में पिता से नही बन रही थी तो पिता से बचने के लिए एक अति से दूसरी अति पर चली गई थी.यह एक नर्क छोड़कर सुख-शान्ति की तलाश में एक दूसरे नर्क का चुनाव भर ही तो था.  ऐसा भी नहीं है कि उसे यह सब नहीं मालूम हो,इतनी समझदार तो हर लड़की होती ही है और मैंने उसे सब ऊँच-नीच बताई भी थी,फिर भी वह अपनी ही करने पर उतारू थी.मुझे लगा कि इससे तो अच्छा था कि वह मुझसे विवाह कर लेती.मैंने इस विषय में पेटलावद जाकर राजेश से बात की.उसने मुझसे कहा कि इससे तो अच्छा था कि वह तुमसे शादी कर लेती.उसी ने मुझसे कहा कि अभी भी कुछ  &lt;span class=""&gt;नहीं बिगड़ा&lt;/span&gt; है,तुम कल ही इंदौर चले जाओ और उसे मनाकर उसे शादी के लिए राजी कर लो.&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसी रात जब हम दोनों इंदौर-खवासा बस से वापिस बामनिया लौट रहे थे,तो मन में मेरे यही निश्चय था कि मैं कल सुबह इसी बस से इंदौर चला जाउगां कि उसी बस में मुझे आर्ची की माँ मिल गई.वह आर्ची को इंदौर छोड़कर लौट रहीं थीं.मैंने अवसर पाकर उनसे बातचीत की तो उन्हीं से पता चला कि आर्ची इंदौर किसी नर्सिंग की ट्रेनिंग के लिए नहीं वरन एम.एस.डब्लू.  याने मास्टर इन सोशल वर्क का कोर्स करने के लिए गई है.मेरे लिए यह एक नई बात थी.मैंने बामनिया में उतरकर राजेश से इस विषय में बात की तो उसने मुझे इस विषय के बारे में बताया और साथ ही बामनिया में एक मेडम हर्षलता पाल का नाम भी मुझे बताया कि मैं इन मेडम से जाकर मिल लूँ और वह मुझे इस बारे में और विस्तार से बतला देगीं क्योंकि उन्होंने यही कोर्स किया हुआ है. पठान की उनसे दोस्ती है.मैंने अगले दिन पठान को पकड़ा और उसके साथ उनके घर गया और मेडम पाल से इस विषय में पूरी जानकारी ली.साथ इंदौर में इस कालेज का पता भी ले लिया.उस दिन जब मैं घर लौटा तो मेरा तनाव काफी हद तक छट चुका था.   &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt; &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-405089620168364684?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/405089620168364684/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=405089620168364684' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/405089620168364684'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/405089620168364684'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/01/blog-post_15.html' title='पल-प्रतिपल     (भाग-चार)'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-8219330059555165664</id><published>2009-01-11T11:37:00.001+05:30</published><updated>2009-11-15T19:03:38.149+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'>पल-प्रतिपल      (भाग-तीन)</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;पल&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;-प्रतिपल&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;span style="color:#990000;"&gt;(भाग-तीन)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नबम्बर का माह मेरे लिए अस्वास्थ्यकर सिद्ध हुआ.मेरी पुरानी बीमारी फिर उभरकर आ गई.मेरे फेफड़े 1984 के भोपाल गैस-कांड में बुरी तरह ख़राब हो गए थे जिसके कारण मुझे अब साँस लेने में तकलीफ होने लगी थी.भोपाल में मैं जब तक भी रहा तब तक तो मैं रोज़ ही बड़े तालाब में तैरने जाया करता था और करीब दो घंटे तक तैरा भी करता था.सिगरेट-तम्बाकू-शराब मेरी आदत में शामिल नहीं थें.हालाँकि अपने कालेज के शुरूआती दिनों में मैंने सिगरेट और शराब दोनों का सेवन भी किया था, पर वह छः-आठ माह से ज़्यादा का दौर नहीं था.कभी-कभार बियर ज़रूर पी लेता था पर वह भी साल में दो-चार बार से ज़्यादा नहीं था.मतलब यह कि यह सब मेरी जीवन शैली नहीं थी जिसके कारण अक्सर फेफड़े खराब हो जाया करते हैं,मैं तो गैस का शिकार था.फिर यहाँ बामनिया में जहाँ सप्ताह में एक बार ही हाट लगा करती थी जिसमें साग-सब्जियां आया करती थीं.हम आख़िर कितनी सब्जी खरीद कर रख सकते थें. उस पर तुर्रा यह कि खाना कौन बनाए - पहल कौन करें,कौन बनाये.अतः पर्याप्त पोषण नहीं मिलने के कारण भी मेरी बीमारी उभरकर आ गई थी.आगे के दो माह मैंने एक दुःस्वप्न की भांति बीताये. मैं भोपाल चला आया और फिर अयोद्धा-कांड ने मुझे अपने ही घर में क़ैद कर दिया.अयोद्धा की रक्तरंजित गूँज भोपाल में भी सुनाई दी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्चना को मैंने यहीं से खोना शुरू किया था.मैं जब ठीक होकर वापिस बामनिया पहुँचा तो मुझे पता चला कि आर्ची समोई में है और मैं नए साल में अर्चना से मिलने समोई जा पहुँचा.वह चौंकी थी,प्रेम अंततः चौंकता ही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"जीवन सुना जिसे, उसकी तलाश में निकले, &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;यह किस क़ातिल, की तलाश में निकले."&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्चना वहां मुझसे बहुत प्यार से पेश आई.हम दोनों ने वहां एक ही कमरे में क़रीब दो घंटे साथ-साथ बीताये.वहीँ मैंने उसे अपनी बाहों में समेटते हुए उससे कहा कि क्यों न हम दोनों अगले माह या होली के आस-पास शादी कर लें.वह शर्मा गई-वह झिझक गई.मैं वहां से ढेरों मीठी स्मृतियाँ लेकर बामनिया लौट आया, पर उसे वहां कई-कई ताने सुनने को मिले.हमारे द्वारा बीताये गए वो दो घंटे उस पर भारी पड़े,यह दुनिया रंग-बिरंगी बाबा.इस बात पर वह मुझसे बहुत ही नाराज़ हुई और यह बात उसने मुझसे कई बार कही और मैं उससे हमेशा यही कहता रहा कि तुम समोई की बात को इतना तूल ही क्यों देती हो, पर वह मानती ही नहीं थी.फिर भी धीरे-धीरे ही सही हम दोनों लहरों की मानिंद अपने प्रेम को जीते रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;'अपने ही आंसुओं के भीगोये हैं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;क्यों इन बरसातों को दोष दें, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;अपने ही ग़मों से घायल हैं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;क्यों इन तलवारों को दोष दें.'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;थोड़ा और पीछे जाता हूँ या सच कहूं तो आज हवा में जीवन के गुजरे पल टेबिल पर पड़ी क़िताब के उड़ रहे पन्नों की भांति रह-रहकर ख्यालों को रोशन कर रहे हैं.आज 24 मार्च है और मैं गाथा कहना चाहता हूँ 23 मार्च की.एक हर्फ़ 30 मार्च 1990 से या रहने दीजिये,इस तरह तो इस राज की कहानी कुछ ज़्यादा ही लम्बी हो जायेगी.वह  30 जुलाई का दिन था और कोटरा में व्यवसाय के दौरान मुझे जो अर्चना मिली थी,जिसका ज़िक्र मैं पहले ही कर चुका हूँ, उस अर्चना की यवनिका इसी दिन गिरी थी.तमाशा ख़त्म-पैसा हज़म.साहिर ने लिखा है कि,".......वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,उसे कहीं एक अच्छे मोड़ पर छोड़कर आगे बढ़ जाना ही अच्छा होता है." वहीँ मैंने लिखा था कि जब प्यार अपनी सार्थकता खोने लगे तब उसकी हर अर्चना बंद कर देना ही उचित है,क्योंकि जीवन के रंगमंच पर और भी कई अंक आपकी प्रतीक्षा कर रहे होते हैं.मैं साहिर के साथ स्वयं को खड़ा नहीं कर रहा हूँ पर यह सच है कि मैंने अपने जीवन के हर मोड़ पर प्यार की प्रतीक्षा की है और आज तक यह प्रतीक्षा मृग-मरीचिका ही साबित हुई हर शाम &lt;span class=""&gt; तन्हा ही &lt;/span&gt;घर लौटा हूँ.समय-जीवन,दोनों ही प्रवाहमान हैं ही,साथ ही मेरे जीवन में प्रेम भी प्रवाहमान रहा है.यह अर्चना भी उस दिन,ममता की तरह मुझसे कभी न लौटने वाले पल की तरह दूर चली गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज यह सब बातें मुझे इसलिए याद आ रहीं हैं क्योंकि मुझसे जुड़ी यह नियति इस अर्चना को भी मुझसे दूर कर देने के लिए अपनी बिसात बिछा चुका थी.ऐसा मेरा सोचना था.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;'ख़ता नहीं है इन खामोश पत्थरों की, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;ज़ख्म पाये हैं हमने अपनी ही बारिशों में."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#333333;"&gt;दिन, रात की तरफ़ भाग रहे थें और रातें दिन के लिए बेताब थीं और इन सबके बीच मैं त्रिशंकु बना हुआ था.अर्चना का व्यवहार मेरे प्रति बिल्कुल ही बदलता जा रहा था और वह मुझसे बात तक करना पसंद नहीं कर रही थी और यदि कभी बात हो भी जाती तो वह बहुत ही रुखा व्यवहार करती.इस पर मैंने उससे कई बार कहा कि वह मुझसे इस तरह का व्यवहार नहीं करे.प्रेम सिर्फ़ प्रेम होता है.अकारण-बेशर्त.यह दिल के बदले दिल की सौदागरी नहीं है.यहाँ हर व्यक्ति प्रेम करना चाहता है, पर हर व्यक्ति दूसरे के प्रेम के विरुद्ध है.पूरी मनुष्यता इसी दुबिधा के साये में जी रही है कि कोई तो उसे प्यार करे, पर वह स्वयं प्यार को नहीं समझ पा रहा है कि प्यार प्रतीक्षा नहीं है,प्यार तो पहल का नाम है, आप पहल करें कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ,इसकी परवाह मत करो कि कोई आएगा और तुमसे कहेगा कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ.इस प्रतीक्षा में पूरा जीवन निकल जाता है और कोई नहीं आता है,कोई आहट खुशी की-सुख की सुनाई नहीं देती है, फूल खिलने से रह जाते हैं और हम अतृप्त ही मर जाते हैं.मेरा मानना है कि यदि आपने प्यार के कुछ पल भी अपने प्रेमी के साथ बीता लिए तो फिर शेष जीवन में परमात्मा की-मोक्ष की कोई प्रार्थना-कोई वासना नहीं रह जाती है.यहाँ हर व्यक्ति सुख की चाह में भटक रहा है और दूसरे के सुख के विरुद्ध खड़ा है.यह एक ऐसी अनबुझ पहेली है,जो किसी युग में शायद समझ में आ जाए या शायद नहीं आए,यहाँ तो मैं अपनी कहता हूँ. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"तेरे रुख़-ए-नक़ाब पर, ऐ ज़िन्दगी यह तसव्वुर, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कि हुआ करेगें बे-नक़ाब,हम भी कभी-कभी.'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अतीत के बाहर आज ज़िन्दगी के रुख़-ए-नक़ाब पर मेरी सूरत-ए-हाल यह है कि इतिहास के कई-कई पन्ने पलटते जा रहे हैं और जिसे इतिहास दोहराना कहते हैं,वही कर रहा हूँ.आज फिर 11 नवम्बर 1986 की तवारीख़ 23 मार्च 1986 के नक़ाब में बे-नक़ाब मेरे सामने है.साढ़े सात वर्ष का यह सफ़र कोई मामूली सफ़र नहीं है.सन 86 का वह प्रेमी,जिसके पास शिद्दत है-जूनून है,जो छात्र है,कमाने के नाम पर कुछ ट्यूशन हैं,बेरोज़गारी का लेबल लगा हुआ है,दुनिया भर की झिडकियां हैं जो उसे उसके रिश्तेदारों ने उसे दी है,पर जिसके पास शब्द हैं,आज की तरह,जिनसे 'दस्तक' देता-देता थक चुका है,जिसकी 'आराधना' धूमिल पड़ चुकी है.जिसके सपनों की गली अब कहीं नहीं जाती है.यह साधक जिसके स्वरों की गूंज सिसकियों में और उसकी यह सिसकियाँ अब एक गहरी खामोशी में बदल गई हैं.खंडित ताजमहल के साथ जिसने जीवन स्वीकार्य कर लिया है.आज सिर्फ़ शब्द रह गए हैं मेरी अभिव्यक्ति के साधन के रूप में और मैं इन्हीं शब्दों से घिरा हुआ हूँ.कई बार तो लगता है कि यही शब्द मुझे ज़िन्दा रखे हुए हैं.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;जब मैंने पहली बार "दस्तक' लिखना शुरू की थी,ठीक-ठीक कह नहीं सकता कि इसका विचार मेरे मन में कहाँ से आया था,पर वह था एक क्रन्तिकारी और विद्रोही विचार.प्रेम तो अग्नि-शलाका सदृश्य होता है.प्रेम के धरातल पर ऐसे विद्रोही विचारों की निरंतरता बनी रहती है.इसे मैं विद्रोह कह रहा हूँ तो सिर्फ़ इसीलिए कि हमारे समाज ने प्रेम को-प्यार को रीति-परम्परा के विरुद्ध एक तरह से विद्रोह ही माना है.उसी समाज की तथाकथित मानसिकता और उसकी कतिपय रीति-परम्परा के अंहकार की संतुष्टि के लिए 'विद्रोह' कह रहा हूँ.पर 'दस्तक'&lt;span class=""&gt;  का विचार   &lt;/span&gt;निश्चित ही अनूठा-अदभुद और क्रन्तिकारी तो था ही क्योंकि उसके प्रारम्भ में भी उससे बहुत प्रभावित था. हालाँकि कई दृष्टिकोण से मैं तब गलत था.उस दिन भी ग़लत था और आज भी ग़लत ही हूँ. मुझे लिखना चाहिए था या नहीं यह तो अलग बात है,पर मुझे किसी को भी दुःख पहुचने का कोई नैतिक आधार नहीं है और 'दस्तक' के साथ यही अपराध मैंने किया था,पर जूनून हमेशा जीतता है,ऐसा मेरा सोचना है.तब शायद यही हुआ था.आज मैं कुछ भी सोचूं क्योंकि आज मैं बड़ा हो गया हूँ,पर उस समय...........!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"जब हदों से गुजर गए आसूँ, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कितनी यादों को जगा गए आसूँ.'&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;और आज साढ़े सात साल बाद,फिर वही फाल्गुन माह और इसके छिटके-छिटके रंगों से बे-रंग मैं.आज मैं परिपक्व हो गया हूँ,कुछ ज़्यादा समझदार हो गया हूँ.नौकरी कर रहा हूँ,बे-रोज़गारी का लेबल मुझ पर से हट चुका है.रिश्तेदारों की झिड़कियां कम या लगभग बंद हो चुकी हैं,आख़िर उन्हें अपनी या अपने किसी रिश्तेदार की किसी योग्य कन्या से मेरा विवाह करना है,तो अभी तो उन्हें मुझमे ढेर सारी खूबियाँ दिख रही हैं. पर इन सबसे परे आज भी शब्द मेरे अपने हैं.विचारों की परिपक्व श्रृंखला है.जीवन को, उसकी विषम परिस्थितियों को - समताओं -विषमताओं को समझने-बूझने की शक्ति है-सामर्थ्य है.हालाँकि आज मैं पहले से ज़्यादा एकाकी हूँ,फिर भी किसी से कोई शिकायत नहीं है.प्रेम के प्रति मेरी प्रतिबद्धता आज भी वही है.पर आज राज बदला-बदला है.विघटित,टूटा हुआ,बिखरा हुआ.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;"मैं किरणों से - &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;भर देना चाहता था अपना घर, &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;और इस चाह में - &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;अपनी छत खो बैठा." &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;अर्चना और मैं जिस दिन से मिले थें,कभी भी एक पल के लिए भी साथ बैठकर दो बातें चैन से नहीं कर पाए थें.धीरे-धीरे हमारे संबंध तनावपूर्ण होते जा रहे थें.इसका असर मेरे काम और मेरे स्वास्थ्य दोनों पर पड़ रहा था.मेरी पढ़ाई के दौरान ही मेरी नौकरी लग गई थी,अतः मेरी परीक्षा के दिन भी आ चुके थें,मैं राजनीति-शास्त्र में एम.ए. कर रहा था. अब मैंने अपना सारा ध्यान पढ़ाई में लगा दिया और फिर सारी बातों को दरकिनार कर दिया.इन सबके बीच हमारी बातचीत फिर शुरू हुई.हुआ यह कि एक दिन अर्चना को देखने लड़के वाले आए और उसे वह लड़का पसंद नहीं आया.इधर ठीक एक दिन पहले मैंने पावर-हॉउस ख़रीदा था.इस विषय पर उसने मुझसे पूछा तो मैंने मज़ाहिया लहज़े में कहा कि हमारी शादी के बाद जब मैं दिनभर ऑफिस में रहूगां तब तुम बोर न हो इसलिए मैंने यह पावर-हॉउस ख़रीदा है. फिर कुछ दिन अच्छे निकलें.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;यहाँ से शुरू हुआ सिलसिला एक नया मोड़ लेकर उस दिन आया,जब उसका पहला पेपर था,वह समाजशास्त्र में एम.ए. कर रही थी.उस दिन पेपर के बाद हमारा मिलना तय हुआ था,उसी दिन मुझे भी भोपाल जाना था.ठीक दो दिन बाद मेरी भी परीक्षा प्रारम्भ होने वाली थी.सब-कुछ तय होने के बाद भी उसे लेने उसकी बुआ का लड़का वहां पहचान और वह उसके साथ चली गई.यह घटना हमारे संबंधों की आधारशिला को हिलाकर रख गई.पहली बार मुझे यह एहसास हुआ कि मैं अर्चना के लिए किसी खिलोने से कम नहीं हूँ,जब भी उसका जी चाहता है,वह मुझसे खेलती है और जब जी नहीं चाहता है तो फिर नज़र उठाकर भी नहीं देखती है.मैं जिस घर में रहता था,उसके पीछे वाले छज्जे में मैं घंटों उसकी एक झलक पाने के लिए खड़ा रहता था.मेरे क़रीबी नन्द,पठान.राजेश और अन्य मुझे इसके लिए टोकते भी थें,लानतें भी भेजते थें,खरी-खोटी भी सुनते थें.पर मुझ पर इन सबका कोई असर नहीं होता था.पठान अक्सर मुझसे कहता था कि,'राज,यह लड़की तुझे बेबकूफ बना रही है.यह तुमसे प्यार नहीं करती है.इनके खानदान में कभी किसी ने प्यार किया है जो यह करेगी."&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मैं इन सब बातों को अनसुना कर जाता.घंटों कि तपस्या के बाद जब मैं उसकी एक झलक पा भी जाता तो पाता उसका लटका हुआ चेहरा,झुकी हुई आँखें.उन दिनों वह मुझे तब ही देखती थी,जब वह चाहती थी.हमारे बीच संवादहीनता की स्थिति थी.हालाँकि वह अयह सब जान-बूझकर करती थी. उसकी इन हरकतों से मुझे दुःख होता था.पर मैं हर बार यही सोचता था कि आज नहीं तो कल वह मेरे प्यार को-अपने प्यार को समझ ही जायेगी और सब-कुछ ठीक हो जायेगा.प्रेम अपनी शाश्वतता सिद्ध कर ही देगा.मैंने उससे कई बार पूछा भी कि यदि उसे कोई परेशानी हो तो वह मुझसे कहे.मैं उसके लिए सब-कुछ करने के लिए तैयार था.परन्तु वह हर बार चुप लगा जाती और मैं आहत-सा रह जाता.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;'दे दिया जब - &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सपनों को जन्म फिर, &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;हुआ थोड़ा हतप्रभ, &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;थोड़ा चकित,&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;थोड़ा क्रोधित....,&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;कि यह क्या कर बैठा मैं.......!"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मेरी स्थिति बड़ी विचित्र हो चुकी थी.मैं किससे अपने दिल का हाल कहूँ समझ में नहीं आ रहा था.बिल्कुल अकेला पड़ गया था.मुझसे रोज़ ही हमारे संबंधों को लेकर ढेरों सवाल पूछे जाते और मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था.ज़्यादा ज़ोर देने पर मैं यही कहता कि हमारे संबंध अच्छे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#333333;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#333333;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-8219330059555165664?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/8219330059555165664/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=8219330059555165664' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/8219330059555165664'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/8219330059555165664'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/01/blog-post_10.html' title='पल-प्रतिपल      (भाग-तीन)'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-5444926943119001520</id><published>2009-01-07T23:57:00.001+05:30</published><updated>2009-11-15T19:02:18.038+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'>उपन्यास-    पल-प्रतिपल -(भाग-दो)</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;                    &lt;span style="color:#ff9900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;            &lt;span style="font-size:180%;"&gt; &lt;span style="color:#990000;"&gt;पल&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#990000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;-प्रतिपल&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;span style="color:#ff9900;"&gt;-(भाग-दो)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"सुनो दिलदार मेरे,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आओ की किसी ख्वा़व की ताबीर करें,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आज कुछ ऐसा हम-तुम करें,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कि हो भी इंतजार बहारों को आने का,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;एक ऐसी ज़मीं मोहब्बत की तैयार करें."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह गाथा उसी दिलदार की है.इस गाथा में भी प्रेम को पा लेने की उत्कंठा में स्वयं को खो देने की चाहत है.प्रेम में पूरी तरह ख़ुद को डुबो देने की लालसा है.प्रेम कर प्रेम जैसा सब-कुछ पा लेने की इच्छा है.और खोने की धुन में यह परवानगी ख़ुद शमां बन जाने की दास्ताँ है."जलता हुआ दीया हूँ, मगर रोशनी नहीं....." की तर्ज़ पर.यह प्रेम भी बड़े अजीब किरदार हमारे आस-पास जुटा देता है और फिर यही प्रेम उन्हें आपसे खेलने की पूरी-पूरी इजाज़त भी दे देता है. दरअसल प्रेम में आप, आप कहाँ रह जाते हैं......आप तो वो हो जाते हैं, जो आपका प्रेम होता है और यही प्रेम का हो जाना ही दुनिया को कई-कई बातें कहने का अवसर देता है.यह उसी प्रेम की कथा है.&lt;br /&gt;अर्चना का आगमन मेरे जीवन में,जीने का एक नया संदेश फूँक गया था. अब मुझे लगता था की अर्चना के साथ मेरी परिस्थितियां एकदम अलग हैं.ममता के समय तो मैं कुछ भी नहीं था.स्कूल-कालेज में पढ़नेवाला एक मामूली लड़का, जिसके पास आज कुछ भी नहीं है सिवाय सपनों के,जो इस उम्र में बहुतायत हुआ करते हैं और उन सपनों पर सवार होकर किसी भी आसमान तक जाया जा सकता है पर यथार्थ इस सफर की वसूली बहुत निर्ममता के साथ करता है, जैसा कि उसने मुझसे इन सपनों की कीमत वसूली थी,मुझे ममता से अलग करके.पर अब मुझे लगता था कि अब परिस्थिति एकदम अलग हैं, मैं एक बेहतर नौकरी में हूँ.सपने और सच की दूरियां समझने लायक परिपक्व्व उम्र हो चुकी है.ऐसे में यह प्रेम जीवन-पथ पर साथ जीने-मरने की रस्म अदा अवश्य करेगा. पर शायद यहाँ भी पीड़ा अनाहट चली आई.ओशो ने कहीं लिखा है,"प्रेम अपने साथ पीड़ा अवश्य लता है.आप प्रेम करेंगे तो पीड़ा अवश्य ही मिलेगी."&lt;br /&gt;अर्चना, उसे मैं प्यार से आर्ची कहकर बुलाने लगा था.उसकी अपनी समस्याएँ थीं. आर्ची के पिता की आँखें ख़राब ही तथा वह एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थें,चूँकि उन्हें ठीक-ठीक से दिखाई नहीं देता था तो आर्ची अक्सर उन्हीं के साथ रहा करती थी.उनकी नौकरी यहाँ बामनिया से करीब सौ किलोमीटर दूर राणापुर के पास समोई नमक गॉंव में थी. दशहरे के आस-पास उसके पिता उसे अपने साथ लेकर चले गए और फिर वहीँ से गुजरात में नवसारी में वह अपनी आँख के आपरेशन के चले गए.यह सब मुझे पता नहीं था.मैं अर्चना का यहाँ बामनिया में इंतजार कर रहा था कि नवरात्री के बबाद जब वो यहाँ आएगी तो मैं उसके साथ रतलाम जाउगां.पर मैं यह सोचता ही रहा और वो नहीं आई. मैं थोड़ा निराश हो गया और यह पता करने में जुट गया तब मुझे यह सब बातें पता चलीं.वहीँ मुझे पहली बार उसके पिता के विषय में भी पता चला . यह एक पढ़ा-लिखा बौद्धिक व्यक्ति है.साहित्य और कला में उसकी खूब रूचि है,पर सामाजिक-पारिवारिक रूप से ठीक विपरीत धूरी पर खड़ा हुआ है."यमराज", जैसा कि मुझे आर्ची की छोटी बहनों ने बताया था,उन्होंने अपने पिता का यही नाम रख रखा था क्योंकि उनका अपने घर में कुछ इसी तरह का व्यवहार था.मेरे लिए यह विचित्र बात थी.पर मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया.आर्ची घर की सबसे बड़ी सदस्य थी.कुल उम्र २१ साल.खैर जब हम लंबे विछोह के बाद मिले तो मैंने उससे कहा,"मुझे तुम्हारा इस तरह जाना अच्छा नहीं लगता है." तब उसने मुझसे कहा कि, "अभी मैं दूसरे बंधन में हूँ, जब तुम्हारे बंधन में बंधुगी, तब तुम ही देखना."&lt;br /&gt;यह बात कितनी सच थी. मैं इसमें नहीं पड़ना चाहता. हाँ, यदि वह मुझसे दूर रहती तो ऐसा ज़रूर लगता था कि अब विश्व में करने को और कुछ नहीं रह गया है.कुछ भी अच्छा नहीं लगता था और स्वयं को असहाय महसूस करता था.संगीत का मुझे बहुत शौक है और मैंने संगीत के प्रत्येक आयाम को जानने-छूने की कोशिश भी की है, यह अलग बात है कि मैं इसमें अनाड़ी ही सिद्ध हुआ हूँ. अपनी किशोरावस्था में मेरे पास मेरे मित्र का वाकमेन था जिसे मेरे पिता ने मुझसे छीन लिया था,क्योंकि उन्हें लगता था कि मैं बिगड़ रहा हूँ और अपनी पढ़ाई पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रहा हूँ. उन्ही दिनों मैंने एक स्वप्न बुना था कि एक दिन मेरे पास अपना टेप-रिकार्डर होगा.जब यहाँ मेरी नौकरी लगी, तब यह स्वप्न मुझे यदा-कदा आकर छेड़ जाया करता था.परन्तु मुझे सिर्फ़ रूपये नौ सौ चालीस ही बतौर तनख्वाह के मिला करते थें, जिसमे मेरा रहना-खाना और अन्य खर्चे भी शामिल थें. अतः यह स्वप्न मैं कैसे साकार करता. फिर भी यह स्वप्न एक आकांक्षा बन मुझे पर हावी हो रहा था.मैं यह आकांक्षा पूरी करना चाहता था पर एक तरफ़ मेरा प्रेम भी था.आर्ची उस समय समोई में थी और मुझे लगता था कि अब मेरे सारे सुख तो उसी के साथ जुड़े हैं और उसने मुझे बताया था कि वहां समोई में न बिजली का पता है, न रेडियो-न टेप,अतः मैं यहाँ कौन-से शौक पालता.हम एक-दूसरे से प्यार करते थें, पर आर्ची हमेशा ही मुझसे कहती थी कि मैंने तो आज-तक तुमसे यह कहा ही कहाँ कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ. मुझे इसका दुःख तो होता पर मैं हंसकर टाल जाया करता था.समोई से उसके आने कि तारीख निश्चित हुआ करती थीं, अतः मैं राणापुर पहुँच जाता था और फिर हम-दोनों ही वहां से साथ-साथ बामनिया तक आते थें,रास्ते में ढेर सारी बातें हुआ करती थीं.साथ में उसके पिता भी रहते थें.मेरा ऑफिस जिस भवन में था वह उन्ही का था, अतः उनसे मेरा परिचय होने में ज़्यादा वक्त नहीं लगा और परिणामतः मेरा आर्ची के घर भी आना-जाना शुरू हो गया.इससे हमारा मिलन सुगम हो गया.हालाँकि प्रेम के विषय में मेरी धारणा यही रही है कि यदि प्रेम छुपाने से नहीं छुपता है तो उसे छुपाओ भी मत,बल्कि जैसे ही प्रेम हो जाए तो और सहज-सरल हो जाओ.&lt;br /&gt;इसी सहज-सरल प्रेम ने आर्ची के घर की देहरी पर करते ही जीवन की बिसात पर एक नई बाज़ी शुरू कर दी.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;अजीब शै है यह ज़िन्दगी,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सोने-सा इसे बनाया,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;चांदी-सा इसे सजाया,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;माटी के मोल बिक चली जिंदगी." &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ज़िन्दगी की यह शै दीवाली के दूसरे दिन ब्रह्म-मुहूर्त में प्रारम्भ हुई.उस ब्रह्म-मुहूर्त में आर्ची मेरी बाँहों में थी और उसी ब्रह्म-मुहूर्त में हमारे प्रेम की निष्ठुर नियति अमरबेल की तरह बढ़ने लगी थी. उस दिन जब सूर्य अपनी रश्मियों से धरा का श्रृंगार कर रहा था,हम-दोनों के प्रेम के किस्से बामनिया के घर-घर में पहुँच चुके थें.मुझे याद है कि एक दिन आर्ची ने मुझसे कहा था कि,"ज़्यादा प्यार अच्छा नहीं होता है."&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;ज़िन्दगी की राह में हर शख्स रहज़न ही मिला, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;जब भी मिला-जो भी मिला एक दर्द-सा मिला."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जुलाई से प्रारम्भ इस प्रेम-कथा में यह शे'र नवम्बर में जुड़ गया था. है न प्रेम विचित्र. मैंने "आराधना' या "दस्तक" में ग़लत नहीं लिखा था कि प्रेम अपने तमाम आनन्द और सुख के बाद अपनी विविधता और विचित्रता के लिए भी जाना जाता है. ममता के बाद यह मेरा दूसरा अनुभव था.हालाँकि अब परिस्थितियां भिन्न थीं,फिर भी प्रेम यहाँ भी अपनी शाश्वतता के साथ उपस्थित था ही. ममता के साथ मेरा बचपन बीता था और अपने केशौर्य का प्रारम्भ भी उसी के साथ किया था. हम बचपन में खेलते-खेलते कब बड़े हो गए और इस बड़ेपन ने कब हमारे बीच दूरियां बनानी प्रारम्भ कर दी थीं हम दोनों ही नहीं जान पाए.पर उसके लिए मैं ज़्यादा दोषी था.ममता तो शायद ही यह जान पाए कि हमारे बीच यह सब आख़िर क्या था,क्या यही प्यार था.ममता के साथ मैं कभी भी खुलकर नहीं रह पाया था.मनोविज्ञान में जिसे 'प्लेटोनिक लव' कहते हैं,ममता के साथ मेरे संबंध प्लेटोनिक ही ज़्यादा थें. वह लड़की कभी भी मुझे समझ नहीं पाई.हाँ,उसने कभी मुझे कोई पीड़ा या दुःख नहीं पहुँचाया.मैं हर बार उससे इस आशा से मिलता था कि अब तो वह बदल चुकी होगी,अब तो वह मुझे समझेगी.....हालाँकि आज यह बात मैं अपनी उम्र के तीसवें साल में बहुत सहजता से लिख रहा हूँ, पर उस समय सहज शब्द से मेरा परिचय ही कहाँ हुआ था.तब मैं अधीरता का मित्र हुआ करता था.सुबह के स्वप्न संध्या के नाम कर देता था और संध्या के स्वप्न सुबह की झोली में डाल देता था.स्वप्न मुझसे और मैं स्वप्नों से यही अठखेलियाँ किया किया करते थें.ममता को मेरे परती न बदलना था, न ही वह बदली. यहाँ तक मेरी 'दस्तक' की आहट भी वह अनसुनी कर गई थी.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;न तुम मेरे और न मैं तुम्हारा, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;पर संबंधों का गणित है उलझा-उलझा, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;हर पल कोई अर्थ लिए हुए, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;उन आंखों में झाँककर तो देखो."&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आंसुओं से परे जीवन सूखे पत्ते की तरह जब आर्ची के द्वार तक जा पहुँचा,उसमें बड़ा परिवर्तन यह आया कि वह मुझसे कटने लगी. मैंने अपनी डायरी में 5 जुलाई 1990 को संबंधों के विषय में लिखा था कि स्वार्थ कप्रभाव जीवन में इतना बढ़ता जा रहा है कि आज जब कोई नया संबंध बनता है अथवा कोई पुराना संबंध टूटता है तो मुझे कोई अचरच नहीं होता है.पर आर्ची को लेकर मैं अपने ही शब्दों के विरुद्ध जा खडा हुआ.उसका इस तरह मुझसे कटना मुझे सहन नहीं हुआ.दूसरी तरफ़ ढेरों बातें लिए कई-कई मुहँ थें."राज शायद तुम्हे मालूम नहीं, यह लोग अपने को कहने को जैन कहते हैं, पर यह लोग असल में जैन नहीं हैं.इनकी असल जात तो ख़ुद इन्हें ही नहीं मालूम है.यह लोग वर्णसंकर हैं.इनके पिता अपनी जवानी में बहुत अय्याश रहे हैं.शबाब और शराब के विशेष शौकीन....किसी आदिवासी महिला से इनके संबंध भी रहे हैं और उनसे इनके भाई-बहन भी हैं,फिर मास्टरजी ने एक जैनी लड़की से शादी कर ली और ख़ुद को जैन लिखने लगे........" और क्या-क्या सुनोगे. अर्चना का भी एक लड़के से संबंध रहा है और भी एक मुसलमान लड़के से. ऐसी ही बदनामी के चलते यह परिवार पेटलाबाद से यहाँ बामनिया में रहने को मजबूर है.अब बाप की क्षमता इतनी नहीं है कि वह चार-चार लड़कियों की शादी कर सके. अतः वह कहीं भी - कैसे भी इन लड़कियों को ठीकाने लगाना चाहता है. अगर यह लड़कियां अपनी मर्जी से शादी भी कर लें तो उसे क्या करना है,क्या आपत्ति होगी.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;किस्से कहानियाँ हैं यहाँ हर मुहँ में, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;और होंठ सिले हैं हमारे अपने ही डर से, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;होगीं क्या आरजुएँ अब जवाँ यहाँ, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कि है फूलों से रिश्ता पर दामन में कांटें ज़िन्दगी."  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कैक्टस मेरे घर-आँगन में भी फैलने लगे.उनकी चुभन मुझे असहज करने लगी.इन किस्सों में कुछ तो सच्चाईयां तो होगी ही,तब तो यह किस्से यहाँ हर मुहँ में फैले हुए हैं.यह सच था कि आर्ची के पिता के विवाहोत्तर संबंध थें और उसके दादा के भी ऐसे ही कुछ संबंध थे और यह भी सच था की यह परिवार वर्णसंकर-विश्रृंखलित था.मुझे यह सब बातें अंतर तक आहत कर जाती थीं,पर प्रेम क्या कभी 'इस या उस बात' में बंधा है.तब मुझसे ही यह आशा क्यों.मैं किसी भी बात पर पर ध्यान नहीं देता था. पर जिस बात से मुझे सबसे ज़्यादा दुःख पहुँचा था वह बात थी कि आर्ची मुझसे दूर-दूर रहने लगी थी,जैसे कि हम कभी मिले ही नहीं थे.मैं कभी उसकी जिंदगी में आया ही नहीं. मैं घर के पीछे गैलरी में खड़ा उसकी एक झलक पाने के लिए घंटों इंतजार करता और वह बाहर किसी काम से आती पर मुझे देखे बगैर या देखकर अनदेखा कर जाती और मैं अपने ही दुःख में डूबता-उतराता रह जाता.उसका यह कहना कि उसने अभी मुझसे यह कहा ही कहाँ है कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ.......हाँ,सचमुच उसने मुझसे प्यार नहीं किया.&lt;br /&gt;मेरे साथ यहाँ एक और समस्या थी.संबंधों को लेकर मैं बड़ा अंतर्मुखी रहा हूँ. कहने को तो मेरे संबंधों कि सूची लम्बी है परन्तु वह लोग जिनके सामने मैं अपने जीवन की पुस्तक के पन्ने खोलकर रख दूँ, ऐसे सिर्फ़ दो-चार मित्र ही हैं और वह भी सब भोपाल में.यहाँ आकर तो आज तक ऐसे संबंध बन ही नहीं पाए हैं.हालाँकि यहाँ मेरे रूम-पार्टनर धीर और नन्द हैं .दोनों ही ग्वालियर से यहाँ मेरे साथ ही नौकरी करने आए हैं. धीर तो वापिस लौट गया और फिर नन्द और मैं ही रह गए.हम दोनों के सम्बन्ध ऐसे नहीं थे कि वह मेरे जीवन की पुस्तक का उन्मान भी पढ़ पता.हम दोनों का एक ही छत के नीचे रहना सिर्फ़ परिस्थितियों के आगे एक समझौते से ज़्यादा नहीं था.इन सबके विपरीत धूरी पर एक और व्यक्तित्व था- युनुस खान का,जिसे हम पठान या भाई जान कहते थे.पठानों जैसा लंबा-पूरा और ऐसी ही मस्त मौला तबियत का मालिक था. ग़ज़ल और शतरंज का शौकीन.एक अन्य नाम है राजेश का, यह व्यक्ति पी.डब्लू.डी. में उपयंत्री था.इसको दुनिया के विषय पर वाद-विवाद का शौक था.भांग का बेहद शौकीन.भांग की तरंग में इसके पास या तो दुनिया के हर मसले का हल होता था या फिर हर मसले में से एक और नया मसला होता था.इसी के साथ मैंने भांग का स्वाद भी चखा था, पहली और आखिरी बार.फिर इसने जब भी कहा मैंने बाबा भोलेनाथ को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और भांग से तौबा कर ली.इन सबके विषय में बताने का अर्थ यही है कि मैं इन सबसे दिन-रात जुड़ा हुआ था.कारण सिर्फ़ इतना था कि मेरा मकान बामनिया के बाज़ार के मध्य में था और काफी बड़ा भी था,अतः पठान और राजेश की बैठक भी यहीं थी.शतरंज और चाय की चुस्कियों के बीच भाईजान इसे ऐशगाह कहा करता था.पर, एक राज, मैं राज.....इन सबसे बहुत दूर था.बामनिया इतनी छोटी जगह है कि यदि आप यदि यहाँ एक सिरे पर छींक दे तो दूसरे सिरे पर लोगों को पता चल जाएगा.अतः यह सब भी आर्ची और मेरे बीच के सम्बन्धों के उतार-चढ़ाव के साक्षी थें.फिर भी ऐसा बहुत कुछ हमारे बीच घट रहा था, जिनसे यह सब भी अनभिज्ञ थे.जब मेरे पास ढेरों कही-अनकही बातें इकठ्ठी हो जाती तो मैं भोपाल में अपनी पुरानी मित्र-मण्डली में जा धमकता और फिर बियर की चुस्कियों के बीच हर बात हाला बन जाती. इस तरह मैं कुछ हल्का हो जाता और पुनः भर जाने के लिए बामनिया वापिस लौट आता.&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt; &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-5444926943119001520?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/5444926943119001520/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=5444926943119001520' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/5444926943119001520'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/5444926943119001520'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/01/blog-post_07.html' title='उपन्यास-    पल-प्रतिपल -(भाग-दो)'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-6578967258670553423</id><published>2009-01-04T21:12:00.001+05:30</published><updated>2009-11-15T19:00:25.659+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'>उपन्यास,   पल-प्रतिपल   (भाग-एक)</title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;पल-प्रतिपल&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; (भाग-एक)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"किसे सुनाये यह दास्ताँ कि हमने भी बनाया था एक आसमां, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;और&lt;/span&gt; उड़ने की चाह में दर-दर भटकते फिरे थे"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;आज&lt;/span&gt; 24 मार्च 1994 है और मैं इस गाथा कि शुरुआत 23 मार्च 1994 से कर रहा हूँ. यह दिन मेरे जीवन में एक विचित्र-सा मोड़ लेकर आया. मेरे सपनों,मेरी कल्पनाओं,इच्छाओं,उमंगों,जीवन जीने की चाहतों के लिए यह दिन महत्वपूर्ण बन गया.इतना महत्वपूर्ण कि मैंने अपनी डायरी जो 1990 से लिखना बंद कर दी थी या सच-सच कहूं तो समय की धारा में मेरा लिखना छूटता चला गया था, तब इस एक दिन मन की टीस बाहर आने के लिए मचल उठी,टीस का मचलना 23 मार्च से शुरू हुआ और आज 24 मार्च की सुबह मैं यह कथा लिखने बैठ गया हूँ. पर इस 23 मार्च 1994 तक ठीक-ठीक पहुँचने के लिए मुझे अपने जीवन के इतिहास के पिछले कई-कई पृष्ठ पलटने होंगे.इतिहास ऐसे ही लिखा जाता है. एक दिन के इतिहास के लिए विगत के कई-कई पृष्ठ समेटने पड़ते हैं.यही जीवन के इतिहास के साथ भी होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर सबसे पहले मैं अपना परिचय दे देता हूँ, आख़िर पूरी कथा मुझे ही कहनी है और इस पूरी कथा में मेरा और आपका साथ रहेगा ही.मैं राज हूँ, एक साधारण-सा इन्सान, बिल्कुल एक आम इन्सान की तरह. पर कितना साधारण और कितना असाधारण यह तो इस कथा का परिवेश-इसकी पृष्ठभूमि और इस कथा में आने वाले पात्र ही बता पाएंगे और अंत में आप सब.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"इस सफ़र का इतना-सा है अफ़साना 'बादल',&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;हर मोड़-हर गली में है, यादों की बस्ती हमारी" &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;मैंने&lt;/span&gt; जीवन &lt;span style="font-size:+0;"&gt;को जितने ही &lt;/span&gt;दुस्साहस के साथ जीने की कोशिश की,जितना ही जीवन की वैचारिकता को व्यवहारिकता के साथ जीने की कोशिश की, उतना ही हर बार कमज़ोर और हारा हुआ सिद्ध हुआ हूँ.हर बार न जाने किस भ्रम(भ्रम कहना ही ठीक होगा),रेत को अपनी मुठ्ठी में इस आशा से भरता रहा कि एक न एक दिन तो रेत मेरी मुठ्ठी में बंद हो ही जायेगी, पर रेत कभी भी अपनी प्रकृति से मुँह नहीं मोड़ सकी.रेत और मेरे बीच के इस विचित्र द्वंद के चलते-चलते मैं स्वयं रेत हो गया.स्वयं ही घरौंदा बनता - स्वयं ही बिखर-बिखर जाता और फिर-फिर किसी नीड़ के निर्माण के लिए उठ खड़ा होता.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;" डरे आँधियों से घरौंदें बनाने वाले, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;हम तो रेत हैं,रेत ही हो जायेंगे."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;और&lt;/span&gt; फिर....फिर रेत होता चला गया. रेत जैसी फितरत लेकर पैदा नहीं हुआ था.'दस्तक" लिखने के बाद तो एक बारगी लगा था कि अब इस जुनून से लिखना नहीं हो पायेगा.'दस्तक" मैंने नहीं, मेरे उन ख्यालों ने लिखी थी जो ममता के प्रेम की कुनकुनी पीड़ा से जन्मे थें. प्रेम राजनीति का छिछला प्रांगण नहीं होता है कि जहाँ एक होते ही यह प्रश्न उठ खड़ा हो कि अब इसके बाद कौन? ममता जब तक रही, तब तक मेरे प्रेम की परिधि एवं केन्द्र दोनों वह ही रही. हालाँकि हमारे मिलन के साथ ही हमारा बिछुड़ना नियति के हाथों लिखा जा चुका था. शायद हर मिलन ऐसा ही होता है.हर मिलन के साथ ही विरह भी चुपके से साथ आ खड़ा होता है.यह बात मेरे सामने 28 जून 1982 को आई. इस तारीख से से लेकर 11 नबम्बर 1986 तक, इन चार वर्षों के बीच सिर्फ़ मैं था और थी ख्यालों के उजाले की मानिंद ममता.तब मुझे उससे हमेशा-हमेशा बिछुड़ जाने के लिए मानसिक रूप से तैयार होने में बहुत-बहुत समय लगा था.पूरे चार वर्ष और पाँच माह. यह समय शायद ज़्यादा लगे, लेकिन कभी जब कोई 'राज' बनकर जन्म लेगा और किसी 'ममता' से प्यार करेगा, तब वह ही स्वयं ही यह अनुभूति भी करेगा कि यह समय तो कुछ भी नहीं है,क्योंकि प्रेम की वह तीव्रता पागल कर देने की सीमा छू सकी थी. दोष अंततः मेरा ही था, क्योंकि ममता को तो शायद स्वप्न में भी यह भान न होगा कि कोई उसके पीछे इतना दीवाना है. अगर वाग्देवी कि कृपा से 'दस्तक' न लिखी जाती तो शायद आज यह राज भी मर चुका होता. 'दस्तक' की कथा प्रेम और मन के अन्तर्द्वन्द से प्रारम्भ होती है और इन दोनों के बीच मैं, इस अन्तर्द्वन्द का न केवल साक्षी हूँ, वरन इनका पंच भी मैं ही हूँ और इन सबसे परे मैं साधक भी हूँ. शब्द को कहीं से भी लिखना शुरू करुँ, वह ममता को छू ही लेते थें.'दस्तक' में मैं अपनी भूमिका से संतुष्ट था और यह सन्तुष्टी मेरे लिए उस दिन वरदान बन गई, जिस दिन उससे जुड़ा इतिहास 11 नबम्बर 1986 का दिन लेकर आया.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;'आगे कुछ नहीं, अंधेरे ही अंधेरे हैं दोस्त,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;अब&lt;/span&gt; कब तक सफ़र करोगे एक रोशनी के लिए.'&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;मैं तब बीमारी से उठा था, उस वर्ष मैं एम.एस.सी,शायद पूर्वार्ध में था. एक दिन आनन्द ने आकर मुझसे कहा कि राज 5 फरवरी को ममता की शादी है.एक आग-सी सीने में उतरती चली गई.पल भर के लिए नहीं वरन मैं फिर कई-कई पलों के लिए उदास हो गया. वह सभी स्वप्न जिन्हें बहुत पीछे कहीं छोड़ आया था, एकाएक आकर जैसे सिसकने लगे हों. वह समय 'आराधना' का था.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कहीं दूर चलकर हम-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;करेंगे आराधना हम-तुम,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;आधी&lt;/span&gt; मैं- &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;आधी&lt;/span&gt; तुम...."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#333333;"&gt;'आराधना' लिखे जाने तक मैं पद्ममाली अपने मन सहित विचलित-सा इस आसमां-ज़मीं के बीच डोलता रहा. ममता और मुझे नहीं मिलना था, नहीं मिले. उसकी शादी 5 फरवरी को न होकर 23 जून को हुई और मैं औघड़ तब तक स्वयं को इतनी कुशलता से सम्हाल चुका था, जैसा कि किसी माहिर पियक्कड़ को देखकर यह कहना मुश्किल होता है कि इसने अभी पी रखी है या नहीं.उस पूरे दौर में मैंने पाँच महीने तक एक भी रचना नहीं लिखी थी.साथ ही 29 जून 1987 को हम घर से बे-घर हुए थें.मनुष्यता के रिश्तों की संज्ञाओं को मैंने उन्हीं दिनों नए अर्थों में देखा था.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#333333;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;'अक्षरों से संबंध-शब्दों से दोस्ती,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;पर नहीं कोई आहट तक कहीं, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;कहने&lt;/span&gt; को है अखिल-विश्व -&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;पर&lt;/span&gt; नहीं है दूर तक अपना कोई,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;देकर&lt;/span&gt; पीडाएं संबंध-संबोधनों की,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;किसी&lt;/span&gt; ने कहा -नहीं कोई प्यार."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;टूटे&lt;/span&gt; स्वप्नों को मैंने बहुत सहजकर रख दिया और नए सिरे से जीवन शुरू किया. नए स्पंदन के साथ स्वयं को मैं ढालने लगा था.कोटरा में हमने स्टेशनरी की एक दुकान खोल ली थी और स्नातक के बाद से बे-रोज़गारी के ढो रहे बोझ को कुछ हल्का कर दिया.वहीँ एक दिन एक सांवली-सी लड़की से मेरी मुलाकात हुई.उसका नाम अर्चना था.पर हम-दोनों हमेशा एक-दूसरे को देखते ही थें और नयनो की भाषा के यह द्वार भी जब एक दिन बंद हो गए तो मैंने उस भाषा के रोमांस को "अर्चना" में तथा उस भाषा के आंसुओं को "वह क्यों रोई" में शब्दांकित कर लिया.हम अपनी सीमाओं में मिले थें, अपनी सीमाओं में ही रहे और अपनी सीमाओं में ही रह गए.&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;कितने दर्द थें यहाँ आने को बेताब,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;आते&lt;/span&gt;-आते उन्हें छुपा गए आंसू."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;'कोई प्यार करेगा 'बादल' से,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;आंखों&lt;/span&gt; को थका गए आंसू"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;बीतता&lt;/span&gt; समय और बीतने लगा. कभी तेज़ी से - कभी धीरे से. जीवन की मृत्युपरंत यात्रा यायावरी ढंग से चलती रही.जुलाई 1991 में मेरी नौकरी लग गई और मुझे भोपाल छोड़ना पड़ा, यही कोई 400 किलोमीटर. मैं गोल-गोल घूमती रोटी के पीछे-पीछे चलता हुआ झाबुआ जिले एक छोटे-से कस्बे बामनिया में जा पंहुचा,जहाँ मेरे भाग्य की वह रोटियां मेरा इंतजार कर रही थीं.जीवन की यह सर्वथा एक नई शुरुआत.यायावरी की एकाकी अब और बढ़ गई थी.अब मैं था, मेरे कमरे की छत थी और मेरे विचारों-स्वप्नों-कल्पनाओं की अनंत-अनादि श्रृंखला थी. इसी मध्य मैं इंदौर में प्रशिक्षण के लिए आया और पूरे दो माह तक इंदौर में ही रहा.नए मित्र मिले.एक बार फिर संबंधों के नए अर्थ मिलें. मैं प्रशिक्षण के बाद कई मीठी स्मृतियां लेकर बामनिया पुनः लौट आया. यह छोटा-सा क़स्बा मुझे पहले दिन से ही पसंद नहीं आया था. मैं आज भी यहाँ हूँ, पर सिर्फ़ शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से तो मैं यहाँ रहने के लिए आज तक स्वयं को तैयार नहीं कर पाया हूँ.यह रोटी बुरी चीज़ है या यह पेट बुरा है, मैं नहीं जानता. मैं तो सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि यह मेरा रास्ता न था. मेरी आकांक्षाएं घुट रही हैं और मैं चुप हूँ. एक दिन मैंने यहाँ एक गीत लिखा और मुझे एक चेहरा याद हो आया. ललिता का चेहरा. वह लड़की बहुत अच्छी थी. पर मेरे लिए वह एक दोस्त थी. अब कहाँ है, यह मुझे नहीं पता. पर जीवन के प्रति उसकी अदम्य जीजिविषा मुझे कई बार प्रभावित करती थी. लोग उसके विषय में चाहे जो कुछ भी कहें, मैं जानता था कि वह एक बहुत अच्छी लड़की थी.ईश्वर उसका कल्याण करें.हाँ, मैं गीत की बात कह रहा था.उस दिन यह गीत लिखते हुए उसकी याद आई थी क्योंकि वह हमेशा मुझसे कहती थी कि तुम तो अपने घर में अपने लोगों के साथ रहते हो न, इसलिए तुम्हे मेरे आंसू बकबास नज़र आते हैं. काश तुम मेरी उदासी को छू पाते.....!&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;जिस&lt;/span&gt; दिन मुझे भी यहाँ जन-अरण्य में यह अनुभूति हुई, मैंने ललिता की बात को नमन कर स्वीकार कर लिया. यह गीत आज भी मेरी उदासी को बहलाने के लिए सबसे अच्छा साधन है.&lt;br /&gt;"&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;अश्रु नीर बहा गया कोई, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;मन&lt;/span&gt; पीर बता गया कोई,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;उदास&lt;/span&gt; थीं रातें,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;चांदनी&lt;/span&gt; छुई-मुई-सी, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;चाँद&lt;/span&gt; के आँगन में -&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;दर्पण&lt;/span&gt; तोड़ गया कोई......"&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;उदास&lt;/span&gt; गीत का यह राज सावन की पहली फुहार में उस समय सिहर उठा, जिस समय एक सांवली-सी लड़की ने अपनी सावन की बूंदों से भरी आंखों से पल भर के लिए ठिठाक्कर उसे देखा था. जुलाई का वह महिना, शायद 22 तारीख़ थी, जीवन के सर्वथा नए अध्याय की शुरुआत की.मैं प्रेम की अनूठी अनुभूति से - उसके मृदुल स्पर्श से भर गया था, जिस दिन उसने घर में पहला क़दम रखा था.&lt;br /&gt;मैं अब तक इस कथा में जो कुछ भी लिखता आ रहा हूँ.दरअसल वह सारे शब्द, अब आगे लिखे जाने वाले शब्दों के सूत्रधार भर थें. नाटक की यवनिका तो अब उठी है. मैंने "आराधना' में लिखा था कि प्रेम में जितनी विचित्रताएं पाई जाती हैं, उतनी विविधता-विचित्रता इस ब्रह्मांड की किसी अन्य विधा में नहीं पाई जाती हैं. सच यह है कि प्रेम का अपना कोई गणित-मापदंड नहीं होता है.प्रेम सहज-स्वाभाविक है.प्रेम ने स्वयं को आज तक अस्वाभाविक ढंग से जीया ही कहाँ है.प्रेम कब दबे पाँव - गुपचुप आपके मन-आँगन में आ धमकेगा,कब आपके मन में हौले से एक आहट कर जाएगा, कब आपके दिल का द्वार खटखटा जाएगा, यह कौन जानता है ! अब यह निश्चित रूप से ममता नहीं थी और न ही यह समय ममता से बंधा हुआ था. न ही मैं......मैं तो कई पड़ावों में से गुजरता हुआ आज एक सर्वथा नए परिचय के साथ स्वयमेव में था. प्रेमिका का स्पर्श प्रेमी को और प्रेमी का स्पर्श प्रेमिका को प्रेम के कई-कई स्त्रोत या कहूँ कि सहस्त्रधारा को जन्म दे जाता है. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. आज मैं 'दस्तक' वाले त्रिशंकु से मुक्त था. ढाई आखर नई रोशनी से लिखे जाने लगे. उस दिन शाम हुई थी, वर्षा के बाद बादलों के बीच में से भास्कर-रश्मियाँ हरीतिमा पर थिरक रही थीं और नृत्यमय मैं बामनिया के प्लेटफार्म पर यहाँ से वहां तक कुलांचे भर रहा था. क्या मैं ही था वहाँ या कोई और.......?&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;'भटक आया होगा, कोई और छत पर, &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;मैं&lt;/span&gt; तो उस सावन का 'बादल' नहीं."&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;विचित्र&lt;/span&gt;-सा सावन अब मेरे आँगन में था. बूंद-बूंद नृत्य कर रहीं थीं. तृण-तृण झूम रहा था.पतदल को तो अपनी ही झंकार से होश कहाँ था. हवाएं मुझे छूकर शरारत पर उतारू थीं. बादलों का इतराना क्या कहूँ.&lt;br /&gt;----------------------- ----------------- -------------------------------&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#333333;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#333333;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-6578967258670553423?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/6578967258670553423/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=6578967258670553423' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/6578967258670553423'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/6578967258670553423'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/01/blog-post_04.html' title='उपन्यास,   पल-प्रतिपल   (भाग-एक)'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-2879132882137690097</id><published>2009-01-03T22:26:00.002+05:30</published><updated>2009-11-15T18:57:56.480+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्यास'/><title type='text'>उपन्यास- पल-प्रतिपल</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff9900;"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;पल&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;-प्रतिपल&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;भूमिका&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज से चौदह वर्ष पहले मैंने एक उपन्यास की नींव रखी थी.मेरे कुछ साहित्यिक मित्रों ने जब यह पढ़ा तो मुझे इसे विस्तार करते हुए फिर से लिखने को प्रेरित किया था.पर तब मैं यह कर नहीं पाया क्योंकि मुझे लगता था कि मेरे जीवन का एक अध्याय जो समाप्त हो चुका है उसे ही बार-बार कुरेदने से क्या हासिल होगा और फिर मैं उस दर्द से-उस पीड़ा से दुबारा गुजरना भी नहीं चाहता था.अतः इस उपन्यास को जस का तस ही छोड़ दिया.&lt;br /&gt;पर कहते हैं न कि समय कहीं न कहीं करवट लेता ही है. गुजरे चौदह वर्षों में मैंने बहुत ही कम इस विषयवस्तु पर बात की है.करता भी किससे.यहाँ सुनने वालें तो बहुत हैं और आपसे सहानुभूति रखने वालें भी बहुत हैं पर आपको समझने वाला कौन है? यह एक प्रश्न है जिसकी प्रतीक्षा में सारा जीवन बीत जाए और उत्तर अनुत्तरित ही रह जाए.फिर ख़ुद को ही समझा लें कि शायद यही हमारा प्रारब्ध है.करीब-करीब जीवन ऐसे ही जीया जाता है.&lt;br /&gt;पर मेरे लिए तो समय फिर एक करवट के साथ आया है.अभी कल की ही बात है.मुझसे कहा गया कि मैं लड़कियों में ज़्यादा दिलचस्पी लेता हूँ और ऐसा कुछ करता हूँ कि लड़कियां ख़ुद ही मुझ तक खींची चली आती हैं.यह एक ऐसा आरोप है जिसे मैंने हर बार अपने ऊपर पाया है और कभी परवाह भी नहीं की है क्योंकि ऐसा हुआ होगा मुझे स्वयं पर ही शक़ है.पर उस बातचीत ने मेरे लिए इस उपन्यास के लिए एक नया आयाम खोल दिया. इस उपन्यास का एक ही पात्र है - राज,और यह राज कई-कई पात्रों के साथ,कई-कई घटनाओं के साथ,कई-कई स्थानों के भटकाव के साथ अपने ही जीवन का ताना-बाना कई-कई शब्दों में बुनता हुआ चला है.कथा के केन्द्र में प्रेम है और प्रेम से उपजी पीड़ा है.प्रेम जीवन का सबसे महत्वपूर्ण भाग है,इससे चूके नहीं.एक बार प्यार ज़रूर करें.प्रेम से बड़ा जीवन में कुछ भी नहीं है.प्रेम हमारी प्रकृति है और प्रकृति से मुंह नहीं मोडे,इससे भागे नहीं.अगर जीवन में प्रेम नहीं है तो फिर जीवन भी जीवन नहीं है.आज चौदह वर्ष बाद ऐसे ही एक एक प्रेम कथानक के पन्ने फिर से खोलने जा रहा हूँ.उस दिन भारत-भवन में यह सब बातें नहीं होती तो शायद मैं खामोश ही रहता.चूँकि ब्लाग की अपनी सीमा है अतः मैं यह उपन्यास कुछ भागों में लिखूगां.&lt;br /&gt;आशा है आप पसंद करेंगें.&lt;br /&gt;आपका,&lt;br /&gt;-नीरज गुरु "बादल"&lt;br /&gt;भोपाल.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7041037367458600105-2879132882137690097?l=neerajgurubadal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/feeds/2879132882137690097/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7041037367458600105&amp;postID=2879132882137690097' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/2879132882137690097'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7041037367458600105/posts/default/2879132882137690097'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://neerajgurubadal.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='उपन्यास- पल-प्रतिपल'/><author><name>Neeraj Guru</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09796447479435294138</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='22' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-29CRcsExoC0/TgogEE-Yc-I/AAAAAAAAAow/Ndj2pfIsQCE/s220/nj%2B45.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7041037367458600105.post-4088836574414371410</id><published>2008-11-01T23:53:00.001+05:30</published><updated>2009-11-15T18:57:04.830+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरे लेख :जैसा मैंने अनुभव किया.'/><title type='text'>नपुंसक-युग ?</title><content type='html'>"कृष्ण-स्मृति" में ओशो महाभारत में हुए युद्ध पर अपनी बात रखते हुए कहते हैं,"अनेक लोगों का ख्याल है कि अगर कृष्ण ने महाभारत का युद्ध रोका होता तो भारत बहुत ही संपन्न होता और भारत ने बड़े विकास के शिखर छू लिए होते.बात इससे बिल्कुल उलटी है.अगर कृष्ण जैसे दस-पाँच लोग और भारत के इतिहास में मिले होते और हमनें एक महाभारत नहीं,दस-पाँच &lt;span style="font-size:+0;"&gt;महाभारत लड़े&lt;/span&gt; होते तो हम विकास के शिखरों पर होते."&lt;br /&gt;ज़रा सोंचे, आज हम किस दो-राहे,चौराहे पर आकर खड़े हैं,जहाँ विकास के गीत गाये जा रहे हैं और भारत और इंडिया गुणगान गाये जा रहे हैं.दुनिया के व्यापारी इस देश को अपना बनाए चले आ रहे हैं.हम भी गर्व से सीना ताने,इठलाये-इठलाये घूम रहे हैं.वहीँ हमसे थोड़ी दूर पर आतंकवादी विस्फोट पर विस्फोट किए जा रहे हैं और क्षण भर में ही विकास के नाम का सारा ताना-बाना तार-तार हो जाता है.हमारे आस-पास लाशों का ढेर होता है,धुआं होता है,चीख़-पुकार होती है,वदहवासी होती है.एक आक्रोश होता है.......और क्या होता है,सिवाय अगले विस्फोट के इंतजार के अलावा.&lt;br /&gt;इसी पुस्तक में ओशो आगे कहते हैं,"महाभारत को हुए अंदाज़न पाँच हज़ार साल से ज़्यादा वर्ष हुए होंगे.पॉँच हज़ार वर्षों में हमने फिर कोई बड़ा युद्ध नहीं किया.बाकी हमारी लड़ाईयां बहुत दिवालिया हैं.वे छोट-मोटे झगड़े हैं.उनको युद्ध कहना ठीक नहीं होगा.हमने फिर पाँच हज़ार वर्षों से कोई महाभारत नहीं लड़ा है.अगर युद्ध कि वज़ह से हानि होती है और विध्वंस होता है,त
